अनूठा जैन धर्म!

कई बार इस बात की बहस होती है कि कौनसा धर्म सबसे पुराना है.
कई बार इस बात की भी बहस होती है कि वर्तमान समय में “जैन-धर्म” का पालन “असंभव” जैसा है.
कई बार “पंथ” को लेकर भी बहस होती है.
कई बार अपने ही सम्प्रदाय में कौनसा साधू बड़ा, इस पर भी बहस होती है.

कई बार “दीक्षा” कब दी जाये, इस पर भी बहस होती है.
कई बार “तीर्थ” किसका, इस पर भी बहस होती है.
कई बार “स्त्री” मोक्ष की अधिकारी है या नहीं, इस पर भी बहस होती है.
कई बार “शरीर में चक्रों” को जैन धर्म में मान्यता है या नहीं, इस पर भी बहस होती है.

 

कई बार “जिन पूजन” करें या नहीं,इस पर भी बहस होती है.
कई बार “देव-देवियों” को पूजे या नहीं,इस पर भी बहस होती है.
कई बार “भक्तामर” में ४४ गाथा है या ४८, इस पर भी बहस होती है.
कई बार “अगला जन्म” किसने देखा है, इस पर भी बहस होती है.

जबकि जैन धर्म में मात्र एक नमस्कार महामंत्र है – इस पर सभी एकमत हैं, इसलिए इसमें बहस की बात ही नहीं हैं और ना ही इसमें किसी को कोई शंका है.
(भले ही अभी कई जनों ने इसका “प्रभाव” महसूस ना किया हो, ये कहलाती है : “श्रद्धा).”

आश्चर्य तो ये है कि “अन्य” सभी “बातों” पर बहस करने वाले खुद  पूरे दिन में  “नवकार महामंत्र” की “एक माला” भी नहीं गुणते (यानि “धर्म” में बतायी गयी “किसी भी बात” को पूरी तरह फॉलो नहीं करते, फिर भी अपने को जैनी कहते हैं).

 

किसी व्यापारी के यहाँ बच्चे का जन्म हो तो क्या उसे “व्यापारी” कहेंगे?
जवान होने के बाद वो कहीं अच्छी नौकरी करे, तो भी क्या व्यापारी का पुत्र होने के नाते उसे “व्यापारी” कहेंगे?
उत्तर है : नहीं.
तो फिर एक ऐसा व्यक्ति जो “जैन कुल” में जन्म लेता है और धर्म के नाम पर “शून्य” है, तो उसे क्या कहेंगे?
उत्तर आपको देना है.

A special request by jainmantras.com:

जिसने आज तक कभी प्रतिक्रमण या सामायिक नहीं की है, वो कम से कम चातुर्मास में एक प्रतिक्रमण अवश्य करे.

“धर्म” के पंडित कहेंगे कि मात्र “एक सामायिक” से क्या होगा?    

 

पूनिया श्रावक की “एक सामायिक” का मूल्य “भगवान महावीर” ने श्रेणिक महाराजा के आगे बताया था और वो  है  कि हे श्रेणिक महाराजा, तुम्हारे पूरे साम्राज्य का मूल्य लगाओ तो वो  “एक सामायिक” की “दलाली” (brokerage) चुकाने के लिए भी पूरा नहीं है.

पर ऐसी category की सामायिक करने के लिए पहले “अभ्यास” तो होना चाहिए ना!
एक दिन में “expertise” थोड़ी आ जाती है?

इसीलिए तो अच्छे से अच्छे खिलाडी को भी “नेट प्रैक्टिस” रोज करनी होती है.

इससे Jainmantras.com क्या मैसेज देना चाह रहा है, वो तो आप समझ ही गए होंगे.
बात का मजा तो तब आये कि हम “बहस” करें की “सामायिक” क्यों करें या कैसे करें?

 

(We all are  intellectuals and can discuss on “small issues” for long long hours (even for years).  Let’s  prepare ourselves to “discuss” and “argue” on the “important matters” only to perform them well).

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