किसी ने पूछा कि “तप” करने से कर्म कटते हैं. उस से “आत्मा” प्रकाशित होती है. तो फिर उसका पता कैसे चले कि आत्मा हलकी हुई है या कर्म मुक्त हुई है

जिज्ञासा:

किसी ने पूछा कि
“तप” करने से कर्म कटते हैं.
उस से “आत्मा” प्रकाशित होती है.
तो फिर उसका पता कैसे चले
कि आत्मा हलकी हुई है
या कर्म मुक्त हुई है.

उत्तर :

एक छात्र “परीक्षा” की तैयारी करने
के बाद भी “फ़ैल” होने का भय रखता है.
ऐसा छात्र “पास” भी हो सकता है
और फ़ैल भी !

उसके फ़ैल होने के ही चान्सेस ज्यादा हैं.

परन्तु जिसने खूब तैयारी की हो,
फर्स्ट डिवीज़न का टारगेट रखा हो,
उसे फ़ैल होने का “भय” नहीं होता.

बस कुछ ऐसा ही “तप” के प्रभाव के बारे में समझ लें.

जब “आत्मा” निर्मल हो गयी हो,
तब “कर्म” की स्थिति का पता तो तब भी चल जाता है
जब “लोगों” की दृष्टि ही “तपस्वी” के प्रति बदल जाती है.
उनके प्रति अहोभाव होने लगता है.

उनसे कोई बैर-भाव नहीं रखता.

परन्तु सावधान !

“तप” का “अहंकार” किया
और तुरंत डूबा !

उदाहरण:

हर साल फर्स्ट डिवीज़न आने वाला छात्र
यदि किसी एक साल अच्छी तरह पढ़ाई ना करे,
तो फर्स्ट डिवीज़न तो छोडो,
क्या फ़ैल भी नहीं हो जाएगा?

विशेष:

“मन” “मौन” रहने लगे,
“चित्त” में “शान्ति” रहने लगे,
तो समझ लें कि “आत्मा” निर्मल हो गयी है.

अति विशेष:

“तप” करते समय “ध्यान” भी करें
तो विशिष्ट अनुभव हो जाएंगे.

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प्रधानम् सर्व धर्माणाम् जैनम् जयति शासनम्
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