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जैन धर्म को शुद्ध रूप से कैसे अपनाएं?

केवली कहते हैं कि 1 लाख मुख से नवकार की महिमा कही जाए तो भी पूरी नहीं हो सकेगी.

आज?
कितने व्याख्यान सुने नवकार की महिमा पर?

एक नवकार 500 सागरोपम के पापों का नाश करता है, पर जैनों को विश्वास नहीं होता!

बस आदत और संस्कार वश गिनते हैं,
पर उसका अनुभव कितनों को हुआ है?
बहुत कम को!

इसीलिए तो हनुमान जी, महादेव जी, भैरव, राम – कृष्ण काली, साई बाबा आदि अधिक पूजे जाते हैं – जैनों द्वारा! जैनों के घरों में स्थापित तक होते हैं! इनके बिना चले ही नहीं, पर “अरिहंत” के बिना उन्हें चल जाता है!

आशातना होती है, ऐसा भ्रम बिठा रखा है.

“नवकार” के पहले ही पद पर अधिकतर जैनों का कैसा अहोभाव है, इस बात से पता पड़ जाता है.

“अरिहंत” को किस भाव से नमस्कार हो रहा है, जरा चिंतन करना जब कि बात बात में “ओम अर्हं” कहने का “रिवाज” तक है!

वास्तविकता तो ये है कि अरिहंत पर पूरा भाव और श्रद्धा आ जाए तो दूसरा एक भी देव चले नहीं!

इसीलिए तो जैन मंदिरों में हनुमान जी, महादेव जी, भैरव, राम – कृष्ण काली आदि नहीं होते! कभी तो दर्शन अच्छी तरह किए होंगे!

ये देखकर कर भी आंखों के अंधे नहीं बन रहे? 🙄

विशेष :

Alphabets सीखते समय जब तक बच्चा A लिखना नहीं सीख लेता, उसे B नहीं सिखाया जाता. बारहखड़ी में सबसे पहले “अ” लिखना नहीं सीख लेता, “आ” नहीं सिखाया जाता!

कुछ समझ में आ रहा है?

जैन धर्म की बारहखड़ी “अ” से “अरिहंत” – ऐसे शुरू होती है. ये तो सभी को पता ही है! नहीं क्या? 🙄

🌹 महावीर मेरा पंथ 🌹

भक्ति की शक्ति तभी आती है जब सर्वज्ञ भगवान की महिमा पर विश्वास हो

जैन मंत्रों का प्रभाव

जो पहले से धर्म से जुड़ गए हैं उन्हें परिणाम अपने आप मिलता है, जो परिणाम के लिए धर्म क्रिया करते हैं, उन्हें कुछ नहीं मिलता, ये जैन धर्म के मंत्रों की खास बात है

[13/09, 19:19] Delhi:

जय जिनेंद्र अंकल
आपसे थोड़े दिन पहले बात हुई थी और मैंने आपको बताया था कि मेरी भाभी का अबॉर्शन हुआ है और आपने पित्र दोष की पूजा करने के लिए कहा था और हमने वह पूजा करवा भी लि थी और आपने हमें यह आगाह भी किया था घर में थोड़ी बहुत दिक्कतें आ सकती है

हो सकता है कोई बीमार चलें कभी कोई बीमार चले

उस वक्त तो ऐसा नहीं हुआ था लेकिन अब ऐसा होने लग गया है सबसे पहले तो मेरी भाभी जिनका अबॉर्शन हुआ था उन्हीं के वापस गर्भ धारण हुआ है

और डॉक्टर जुड़वा बता रहे हैं लेकिन दोनों चिपके हुए हैं डॉक्टर बोल रहे हैं ऐसा लाखों में से एक case होता है इनका वापस अबॉर्शन करवाना होगा और घर में हर कोई बीमार चल रहा है

जैसे मम्मी के पिछले 8 दिनों से फीवर हो रहा है
मेरी खुद के माता(chicken pocks) निकल गई है पापा के हार्ट की दिक्कत
मतलब घर में हर कोई बीमार चल रहा है

कृपया मार्गदर्शन कीजिए
आपका मार्गदर्शन ही हमें सही राह दिखला सकता है

उपाय :
कुछ स्तोत्र के ऑडियो सुनने के लिए भेजे गए,
वही जो महावीर मेरा पंथ के YouTube में दिए हुवे हैं

[25/09, 18:47]

जय जिनेंद्र अंकल

आप के बताए मार्ग दर्शन और अरिहंत प्रभु की कृपा से मम्मी के बुखार उतर गई है

भाभी का आज अल्ट्रासाउंड करवाया था जो दो बच्चे चिपके हुए थे आज रिपोर्ट में आया है कि वह चिपके हुए नहीं है हालांकि वह अभी भी एक ही थैली में है यह कहा है इसमें 20 का रिस्क रहता है जिसमें से 14 सप्ताह निकल चुके हैं

लेकिन चमत्कार यह है जो पहले लग रहा था कि दोनों बच्चे जो एक दूसरे से चिपके हुए हैं वह रिस्क अब नहीं है

यह सब आपके मार्गदर्शन और अरिहंत प्रभु की कृपा से ही हुआ है

कृपया आप अपना मार्गदर्शन आगे भी ऐसे ही बनाए रखना

Warning :

भक्ति की शक्ति तभी आती है
जब सर्वज्ञ भगवान की महिमा पर विश्वास हो.

पर अरिहंत की महिमा पर विश्वास हो सके,
इतना पुण्य भी तो होना चाहिए!

इसके लिए अरिहंत की भक्ति पहले से करनी होगी,
जो समय के साथ जितनी बढ़ेगी,
उतना उत्कृष्ट परिणाम मिलेगा.

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किसी ने पूछा कि “तप” करने से कर्म कटते हैं. उस से “आत्मा” प्रकाशित होती है. तो फिर उसका पता कैसे चले कि आत्मा हलकी हुई है या कर्म मुक्त हुई है

जिज्ञासा:

किसी ने पूछा कि
“तप” करने से कर्म कटते हैं.
उस से “आत्मा” प्रकाशित होती है.
तो फिर उसका पता कैसे चले
कि आत्मा हलकी हुई है
या कर्म मुक्त हुई है.

उत्तर :

एक छात्र “परीक्षा” की तैयारी करने
के बाद भी “फ़ैल” होने का भय रखता है.
ऐसा छात्र “पास” भी हो सकता है
और फ़ैल भी !

उसके फ़ैल होने के ही चान्सेस ज्यादा हैं.

परन्तु जिसने खूब तैयारी की हो,
फर्स्ट डिवीज़न का टारगेट रखा हो,
उसे फ़ैल होने का “भय” नहीं होता.

बस कुछ ऐसा ही “तप” के प्रभाव के बारे में समझ लें.

जब “आत्मा” निर्मल हो गयी हो,
तब “कर्म” की स्थिति का पता तो तब भी चल जाता है
जब “लोगों” की दृष्टि ही “तपस्वी” के प्रति बदल जाती है.
उनके प्रति अहोभाव होने लगता है.

उनसे कोई बैर-भाव नहीं रखता.

परन्तु सावधान !

“तप” का “अहंकार” किया
और तुरंत डूबा !

उदाहरण:

हर साल फर्स्ट डिवीज़न आने वाला छात्र
यदि किसी एक साल अच्छी तरह पढ़ाई ना करे,
तो फर्स्ट डिवीज़न तो छोडो,
क्या फ़ैल भी नहीं हो जाएगा?

विशेष:

“मन” “मौन” रहने लगे,
“चित्त” में “शान्ति” रहने लगे,
तो समझ लें कि “आत्मा” निर्मल हो गयी है.

अति विशेष:

“तप” करते समय “ध्यान” भी करें
तो विशिष्ट अनुभव हो जाएंगे.

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अरिहंत उपासना – श्री वासुपूज्य स्वामी यंत्र

अरिहंत उपासना

पूर्व कृत कर्मों का नाश,
सुखी जीवन और
मोक्ष भी निश्चित!

कन्द मूल और रात्रि भोजन का त्याग करना,
रोज नवकारसी करना.

वासु पूज्य स्वामी की प्रतिमा या तस्वीर के सामने दीपक और धूप करना. इनमें से एक भी नहीं करने का कोई ऑप्शन नहीं है.

समय : सवेरे 5-7 के बीच

माला शुरू करने से पहले यथाशक्ति दान
(गौशाला या भिक्षुक भोजन के अलावा)

 

रोज की माला

सोमवार, मंगल, बुधवार को 1
(उच्चारित करते हुवे)

गुरु, शुक्र, शनिवार को 2
(पहली उच्चारित, दूसरी मौन)

रविवार को 3
(पहली उच्चारित, दूसरी मौन, तीसरी उच्चारित करते हुवे)

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आत्मा से विमुख हर साधना “मिथ्यात्त्व” है

जैनों के कुछ संप्रदाय “देव-देवी” की सहायता लेने के पक्ष में नहीं हैं.
उनकी मान्यता के अनुसार ये “मिथ्यात्त्व” है.

 

(आत्मा से विमुख हर साधना “मिथ्यात्त्व” है, ये बात एकदम सही है).

 

पर आज वही समुदाय सिर्फ “धर्म” शब्द को पकड़कर बैठे हैं.
“धर्म-क्रिया” (इसमें “पूजा-पाठ” शामिल है) भी करते हैं
परन्तु “आत्म-चिंतन” की वहां सिर्फ बात होती है

 

“आत्मा” का “अनुभव” वहां कुछ भी नहीं होता.
-ऐसा देखने में आया है.

 

jainmantras.com का ये कहना है कि हमें “पकड़ना” भी है
और “पकड़” कर “बैठना” भी नहीं है.

 

(जैसे पैसा कमाना भी है, और कमा कर संचय भी नहीं करना है
उसका सदुपयोग करना है )

 

इसी प्रकार “धर्म” करना भी है, और “धर्म की बातों” को “पकड़कर” “बैठना” भी नहीं है.

 

जिन-धर्म के इस गूढ़ रहस्य को कोई विरला ही समझ पाता है.

 

यदि समझ ले, तो मत-मतान्तर अपने आप “छू” हो जाए !

 

जैन धर्म में “तापसी” के “तप” को बहुत “हल्का” बताया गया है

जैन धर्म में “तापसी” के “तप” को
बहुत “हल्का” बताया गया है

क्योंकि उसमें “अज्ञानता” है,
सिर्फ तप से तप रहा है.

( ऐसे तप से उसमें भयंकर क्रोध प्रकट होता है
और “अड़ियलपन” आता है,
“लब्धि” भी मिलती है इसमें ना नहीं है
परन्तु क्रोधी और अड़ियल की लब्धि भी किस काम की)?

ऐसी “तप क्रिया” से
“आत्मा” को कोई “उद्धार” नहीं होता.

इसी प्रकार “जड़ता से की जाने वाली क्रिया” से भी
“ज्ञान” प्रकट नहीं होता.
महज “कठोरता” से की जाने वाली “क्रिया”
दूसरों के लिए “अनुमोदनीय” होती है
पर “आनंद” देती ही है, इसमें “शंका” है.

जैन धर्म में पग-पग पर “श्रावक”
गुरु से “धर्म-क्रिया” के लिए आज्ञा लेता है.
ताकि “गुरु” उस पर “ध्यान” रख सके
कि सब कुछ “ठिकाने” से कर रहा है ना नहीं !

पर गुरु ही “जाग्रत” नहीं हो तो?
“मति-ज्ञान” का ही “उपयोग” ना करे तो?
“कुछ अघटित” होने के बाद ही “निर्णय” ले तो?

सार:

जिस स्कूल का “बोर्ड” ही बराबर ना लगा हो,
उस स्कूल में बच्चे का “एडमिशन” करवाएंगे?

बहुत गूढ़ बात है.

“अंधभक्ति” छोड़ कर चिंतन करें.
यद्यपि “उत्कृष्ट जाप और भक्ति” तो
“आँखें” बंद करने पर ही होती है.

पर “भक्ति” में आँखें बंद करने का अर्थ है
“अंतर्मन” में प्रवेश करना.
फिर “आत्म-चक्षु” का खुलना !

विशेष:

“आनंद” पाने के लिए “ठूंठ त्याग” की नहीं
“अज्ञान” और ममत्व” के त्याग की जरूरत है.

“दुनिया” को दिखाने के लिए “त्याग” तो
“शरीर” के माध्यम से करना पड़ता है ना !

परन्तु “शरीर” भी “हमारा” नहीं है
तो फिर “संसार” को “त्यागने” की बात कैसे हो?

जिसने “आत्मा” को जान लिया
फिर भला वो किसको “पाने” की बात करेगा
और किसको “छोड़ने” की !

जैन वो हैं जिनके चेहरे से भी पुण्य झलकता है, ये पुण्य अरिहंत की शरण लेने से मिलता है

जैन वो हैं जिनके चेहरे से भी पुण्य झलकता है,
ये पुण्य 🌹अरिहंत की शरण🌹 लेने से मिलता है.

 

गर्भ से ही जैन सूत्रों और मंत्रों को सुनाया जाए
तो सर्वप्रथम miscarriages होने का डर समाप्त हो जाता है.

 

गर्भवती को कुलदेवी की शरण भी अवश्य लेनी चाहिए. कुल में होने वाली वृद्धि से कुलदेवी प्रसन्न होती है पड़दादी की तरह! उनका आशीर्वाद बना रहता है. 😊

 

शिशु के गर्भ में “आने से पहले” ही श्रावक श्राविकाओं को कुछ धर्म सूत्र अवश्य सुनने चाहिए. स्वयं पढ़ने और सुनने में बहुत अन्तर होता है. श्रावक का अधिकतर धर्म सुनने मात्र से ही होता है, सूत्र स्वयं पढ़े तो इतना पुण्य नहीं होता क्योंकि पढ़ने में अधिकतर लोग अशुद्धियां करते हैं.

 

विडंबना ये हो गई कि व्याख्यान में श्रावकों को धर्म सूत्र सुनने बंद होकर सास बहू के सीरिअल जैसे किस्से सुनाए जाने लगे, ऐसी बातेँ सुनकर पुण्य कहाँ से हो?

 

विशेष :

जितने लोगों ने आंखें बंद करके Jainmantras.com के ऑडियो सुने हैं, भले वो ऑडियो दो मिनट का ही क्यों न हो, उनके शरीर में कंपन अवश्य हुआ है यदि धर्म के प्रति थोड़ी भी श्रद्धा है तो. इससे सरल टेस्टिंग किसी धर्म सूत्र को सुनने की और क्या हो सकती है!

समय के साथ वही ऑडियो जितना और सुनेंगे उतना और अधिक प्रभाव नजर आता जाता है.

कोई भी ऑडियो दिन में एक बार सुन लेना पर्याप्त है.

 

Jainmantras.com द्वारा प्रसारित अकेले लघु शांति ने हज़ारों लोगों को जैन धर्म के प्रति जाग्रति दी है और चैन की नींद भी!

Jainmantras.com ग्रुप की शुरुआत में सभी को पांच सूत्र रोज करने को कहा है, ताकि श्रावक अपना जीवन सुखमय और धर्ममय कर सकें.

इन सबके लिए कोई भी एक सूत्र जैसे नवकार अकेला ही बहुत है. उसका एक ही पद भी!

Jainmantras.com द्वारा प्रसारित अकेले लघु शांति ने हज़ारों लोगों को जैन धर्म के प्रति जाग्रति दी है और चैन की नींद भी!

एक और उदाहरण : 17-8-2020 का मैसेज

Pranam🙏🏻
Jai jinendra🙏🏻
Me sohil puna se
Mene apse march me baat ki thi..
Mera financial ,marriage aur ghar ke personal issues the..
Apne muje laghu shanti ka stotra sunne kaha..
Meri shadi pichle mahine he hui..aur baki sab chize bhi dhire dhire sudhar rahi hai..

Apka bhot dhanyavad🙏🏻
Jai adinath🙏🏻

इसलिए सभी सदस्यों से अनुरोध है कि धर्ममय जीवन बनाएं, सुख अपने आप बरसने लगेगा.

क्योंकि घोर दुःख आता ही तब है जब पुण्य का बैलेंस शून्य हो.

ये पुण्य का बैलेंस अधिष्ठायक देवी देवता बढ़ा नहीं सकते, कई बार तो उनकी घर में साक्षात उपस्थिति हो तो भी वो कुछ कर नहीं पाते. क्योंकि इनको मंत्रों से बाँधा जा सकता है.

सिर्फ़ अरिहंत ही ऐसे देव हैं जो देवों के भी देव हैं. उन्हें किसी भी मंत्रों से कोई बाँध नहीं सकता. जब कि ये देखने में आया है कि एक शिष्या ने अपने गुरु को भी बाँध रखा है, एक आचार्य को उनके शिष्यों ने! सिर्फ गुरुओं को ही समर्पित व्यक्तियों के लिए ये एक चेतावनी जैसा है.

अरिहंत के स्मरण मात्र से पुण्य जाग्रत होता है पर इतना भी बुद्धि में तब घुसता है जब थोड़ा पुण्य बचा हो.

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श्रावकों को इधर उधर भटकना बंद करके जैन मंत्रों पर पूर्ण विश्वास रखना चाहिए

श्रावकों को इधर उधर भटकना बंद करके
जैन मंत्रों पर पूर्ण विश्वास रखना चाहिए.

ये मनुष्य भव ही है जिसमें उत्कृष्ट साधना करते हुवे जीवन सुख पूर्वक जी सकते हैं.

जिन शासन में ऐसी व्यवस्थायें की गई हैं कि श्रावक कर्मों का क्षय करते हुवे निर्बाध रूप से मोक्ष में जाना निश्चित कर सकता है.

योग्य गुरुओं का आश्रय लेकर अपने जीवन को सुख से भोगें भी. पर याद रहे वास्तविक सुख प्रभु भक्ति के अलावा कहीं नहीं है, बाकी जगह सुख का आभास मात्र है जो दूसरों पर आश्रित है, यदि वो नाराज हुवे तो अपना सुख भी हुआ अपने से नाराज!

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मोक्ष का सरल रास्ता

पढ़ें:

भगवान महावीर ने इस एक ही वाक्य में क्या कहा है?

सम्यक ज्ञान की आराधना का फल!

आत्म साधक शास्त्र पढ़ता है,
नहीं भी पढ़ता.

आत्मा में रमण करने वाला
सिर्फ आत्म चिंतन करता है.

“ज्ञान” की आराधना का अर्थ
“आत्म साधना” से समझना,
सिर्फ शास्त्र पढ़ने से नहीं!

शास्त्र पढ़ने वाला “आत्म साधना” करता ही है,
ये जरूरी नहीं है.
कोरे शास्त्र पढ़ने वाले अधिक भ्रमित देखने में आते हैं.

🌹 महावीर मेरा पंथ 🌹 में बार बार आत्म साधना के बारे में बात की गई है.

आत्म साधक को किसी भी सम्प्रदाय से कोई लेना देना नहीं है,
सम्प्रदाय से “लेना देना” उसी का है जिसे कोई पोस्ट की खास पड़ी है और आत्मा की पड़ी नहीं है.

उसे धर्म का स्टाम्प लगाकर पक्का किया जाता है,
प्रॉपर्टी की registry जैसा है
जिसका House tax हर साल भरना है,
Property भले वर्षों से बंद पड़ी हो! 😃

अति विशेष :

ध्यान की विशिष्ट विधि का प्रचार करने वाले बहुत बड़े माने जाने वाले आचार्य से किसी ने पूछा :

क्या आपने ध्यान में आत्मा को देख लिया है?

उत्तर मिला :
नहीं, स्पर्श भी नहीं किया है. 🤭

(सत्य की साधना तो कर रहे थे, उतना जरूर स्पष्ट हुआ).

सार :

ध्यान की इससे बड़ी भ्रमित अवस्था और क्या होगी?

अरे!
ध्यान कर कौन रहा है?
शरीर या आत्मा?

सम्यक ज्ञान में सबसे पहली बात ही आत्मा की आती है.
हम नवकार पढ़ते हैं,
ये नवकार पढ़ कौन रहा है?
शरीर या आत्मा या दोनों?

उत्तर ढूँढ़ना.

🌹 महावीर मेरा पंथ 🌹