मोक्ष का सरल रास्ता

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भगवान महावीर ने इस एक ही वाक्य में क्या कहा है?

सम्यक ज्ञान की आराधना का फल!

आत्म साधक शास्त्र पढ़ता है,
नहीं भी पढ़ता.

आत्मा में रमण करने वाला
सिर्फ आत्म चिंतन करता है.

“ज्ञान” की आराधना का अर्थ
“आत्म साधना” से समझना,
सिर्फ शास्त्र पढ़ने से नहीं!

शास्त्र पढ़ने वाला “आत्म साधना” करता ही है,
ये जरूरी नहीं है.
कोरे शास्त्र पढ़ने वाले अधिक भ्रमित देखने में आते हैं.

🌹 महावीर मेरा पंथ 🌹 में बार बार आत्म साधना के बारे में बात की गई है.

आत्म साधक को किसी भी सम्प्रदाय से कोई लेना देना नहीं है,
सम्प्रदाय से “लेना देना” उसी का है जिसे कोई पोस्ट की खास पड़ी है और आत्मा की पड़ी नहीं है.

उसे धर्म का स्टाम्प लगाकर पक्का किया जाता है,
प्रॉपर्टी की registry जैसा है
जिसका House tax हर साल भरना है,
Property भले वर्षों से बंद पड़ी हो! 😃

अति विशेष :

ध्यान की विशिष्ट विधि का प्रचार करने वाले बहुत बड़े माने जाने वाले आचार्य से किसी ने पूछा :

क्या आपने ध्यान में आत्मा को देख लिया है?

उत्तर मिला :
नहीं, स्पर्श भी नहीं किया है. 🤭

(सत्य की साधना तो कर रहे थे, उतना जरूर स्पष्ट हुआ).

सार :

ध्यान की इससे बड़ी भ्रमित अवस्था और क्या होगी?

अरे!
ध्यान कर कौन रहा है?
शरीर या आत्मा?

सम्यक ज्ञान में सबसे पहली बात ही आत्मा की आती है.
हम नवकार पढ़ते हैं,
ये नवकार पढ़ कौन रहा है?
शरीर या आत्मा या दोनों?

उत्तर ढूँढ़ना.

🌹 महावीर मेरा पंथ 🌹

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