धर्मलाभ !

जैन गुरु को “वंदन” करने पर वो “धर्मलाभ” का “आशीर्वाद” देते हैं.
ज्यादातर लोग इसे “आदत” समझ कर मन में “रो-मां-चि-त” नहीं होते.
“धर्म” का “लाभ” मतलब “पुण्य का उदय!”
पुण्य का उदय तभी होता है जब “पाप” क्षय हो गया हो!

एक पंचमहाव्रतधारी साधू जब ऐसा आशीर्वाद देता है
तो वो “शत-प्रतिशत” सही होने वाला है है….आज से ही और अभी से ही….

हमेशा सत्य बोलकर जिसने “सत्य” की “साधना” की है,
उसके “वचन” भी “सत्य” ही होते हैं.

और जिसके “वचन” सिद्ध होते हैं
उसे और कोई “सिद्धि” की जरूरत है क्या?

इसलिए अपने नज़दीक में ही विराजमान,
सादा जीवन और उत्कृष्ट “संयम” पालने वालों की भक्ति करो,
उनके “आशीर्वाद” से सारे दुःख (भव-चक्र के भी) दूर जो जायेंगे.

बिना पूर्व सूचना दिए एक साधू जब आपके घर  “धर्म लाभ” कहते हुए “प्रवेश” करता है
तो “चमत्कार” आपके “घर” प्रवेश करता है,
जरूरत है आपको  “जाग्रत अवस्था” में रहने की
और मन के भावों को आसमान पहुंचाने की!

दृश्य देखो अपने घर का!

एक जैन साधू आपके “घर” में प्रवेश करने से पहले आपको “धर्म लाभ” देता है!
है कहीं ऐसा सिस्टम जगत में! “घर” आकर आपको “आशीर्वाद” देने वाला?
(आपको कभी लगा कि मुझे “धर्म का लाभ” बोली लगाये बिना ही मिल गया है, कितना भाग्यशाली हूँ मैं !
आपने कभी ये धर्म लाभ “स्वीकार” भी किया है)? यदि हाँ, तो इसका फल आपको तुरंत मिलता ही है.

Check Point: 

एक जैन साधू /साध्वी (चाहे किसी भी सम्प्रदाय के हों);
आपके घर आकर भी कुछ भी खप योग्य वस्तु  ना होने के कारण कुछ भी “गोचरी” ना लें,
तो क्या आपकी आँखों में कभी “आंसूं” आये हैं?

विशेष:
कुछ लोग “भक्ति संगीत” को ही सबसे बड़ी भक्ति मानते हैं. जबकि “भक्ति” किसी भी “स्वरुप” में हो सकती है – बस मन के भाव “उत्कृष्ट” होने चाहियें.

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