भ्रम क्यों नहीं टूटता?

सत्य समझ में आ जाने के बाद भी अधिकतर किस्सों में भ्रम इसलिए नहीं टूटता क्योंकि जग में हँसी होने का भय रहता है. स्वयं को भी लगता है कि आज तक जो किया वो व्यर्थ हो गया! ?

इस मनोदशा से बाहर कैसे आयें?

सबसे पहले ये जान लें कि
“सत्य” जल्दी से सभी को स्वीकार हो ही जाता
तो जैन धर्म के मूल सिद्धांतों को कोई भी प्राप्त कर लेता.

“सत्य” स्वीकार करने के लिए सबसे पहले
आज तक की अपने मन में
जो मान्यताओं की जंजीर ठूंस ठूंस कर भर रखी है,
वो तोड़नी पड़ती है.

पंथ वाद से बाहर आना पड़ता है
लोक लिहाज के लिए एक बार बाहर से न सही,
भीतर से स्वीकार कर लेना है,
यहां निश्चय वाला कार्य पूरा हो गया!

अब आते हैं व्यवहार पर!

जैसे जैसे “निश्चय” मजबूत होता जाएगा,
व्यवहार में भी आए बिना रहेगा नहीं!

क्योंकि धीरे धीरे मन ही नहीं मानता कि
सिर्फ व्यवहार को कब तक घसीटेंगे?

जिस प्रकार आत्मा का कल्याण करना ही परम सत्य
है, ये बात स्वीकार करने पर व्यक्ति अपनों को छोड़ कर दीक्षा ले लेता है, ठीक उसी प्रकार जब उसे लगे कि मेरी आत्म साधना की क्रिया पर अब सम्प्रदाय हावी होने लगा है, तो एक दूसरी जंजीर और तोड़ने का साहस करना पड़ेगा.

जिसे आत्म कल्याण ही करना है,
वो किसी सम्प्रदाय से बंधा नहीं रह सकता
जब सम्प्रदाय में रहकर
आत्म साधना ही नहीं हो रही हो.

? महावीर मेरा पंथ ?