जैन धर्म और पर्यावरण (Jainism & Environment)

“अहिंसाप्रधान” जैन धर्म के चरम तीर्थंकर भगवान महावीर का लांछन है : “सिंह” जो सबसे “हिंसक” माना जाता है – जंगल का राजा जो है – बिना राज्याभिषेक के!

लगभग हर तीर्थंकर का लांछन -पशु पक्षी है. ये सभी लांछन शुभ माने जाते हैं.

तीर्थंकरों  के लांछन इस प्रकार हैं :
आदिनाथ- बैल
अजितनाथ-हाथी
सम्भवनाथ-घोडा
अभिनन्दन-बन्दर
सुमति-क्रौंच
पद्म-पद्म (1)
सुपार्श्व-स्वस्तिक (2)
चन्द्रप्रभु-चन्द्र (3)
सुविधि-मगर
शीतल-श्रीवत्स (4)

 

श्रेयांस-गेंडा
वासुपूज्य-भैंसा
विमल-सूअर
अनंत-बाज
धर्म-वज्र (5)
शांति-हिरन
कुन्थु-बकरा
अर-नंदावर्त (6)
मल्लि-कुंभ (7)
मुनिसुव्रत-कछुआ
नमी-नीलकमल (8)
नेमी-शंख
पार्श्व-नाग
महावीर-सिंह

 

यानि आठ तीर्थंकरों को छोड़कर बाकी सभी तीर्थंकरों के शरीर पर पशुओं के चिन्ह थे.

हिन्दू (जैन भी) संस्कृति में भी पर्वत, समुद्र ,नदी, वृक्ष, इत्यादि पवित्र माने जाने हैं. इसीलिए तीर्थ स्थानों की स्थापना भी ऐसे स्थानों पर ही की गयी हैं. (यहाँ हिन्दू संस्कृति का अर्थ हिन्दुस्तान की संस्कृति से हैं).

जैन धर्म में “कल्पवृक्ष” की बात आती है.
तीर्थंकरों की देशना भी “अशोक वृक्ष” के नीचे ही होती है.
देवताओं द्वारा “भूमि पूजन” की बात भी आती है.

ज्यादातर देवों के “वाहन” पशु-पक्षी हैं.

उदाहरण के लिए
सरस्वती: हंस और मयूर

 

कुछ देवों के मुँह भी पशु-पक्षियों जैसे हैं :
जैसे :
१. श्री माणिभद्र वीर-सूअर
२. श्री धरणेन्द्र-पद्मावती -नाग
३. हरिणगमैशी देव -हिरन
४. श्री गणीपीटक यक्ष-हाथी

स्नान करते समय सच्चे जैनी  कम से कम पानी का उपयोग करते हैं. (जैन साधू तो जीवन भर “स्नान” नहीं करते हैं).
बासी खाना नहीं खाते हैं (इसलिए भोजन पकाने में भी विवेक रखते हैं).
ज्यादा खाना (जैसे गुंथा हुआ आटा) बनाकर फेंकना मतलब धन (धान) का अपमान!

भूतकाल में कई राजाओं को “अन्नदाता” कहा जाता रहा है. “अन्न” (धान) की देवी भी है : अन्नपूर्णा देवी!

 

अन्न के बिना धन व्यर्थ है. भूखा व्यक्ति एक रोटी के लिए क्या नहीं करता और प्यासा व्यक्ति एक गिलास पानी के लिए क्या नहीं करता.

 

इससे ये साफ़ पता पड़ता है कि जैन संस्कृति “पर्यावरण प्रेमी” है और उसे पर्यावरण की रक्षा करना “धर्म” है.

मनुष्य धन की पूजा करता है इसका अर्थ है कि वो “धन” की रक्षा के लिए हर संभव प्रयत्न करता है. पर्वत, पेड़, पशु और पत्थर तक पूजना मतलब : इनकी रक्षा करना. कालांतर में हम इनका अर्थ समझ नहीं पाये और इन्हें पूजने की बात को “हंसी” में उड़ाने लगे. आज वो ही “पर्यावरण” का मुद्दा सबसे बड़ा है. इस मुद्दे को लेकर कई इंडस्ट्रीज बंद करनी पड़ी है और आगे भी करनी पड़ेंगी.

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