पूर्वभूमिका:

पर्युषण (Paryushan) के समय भगवान महावीर का पूरा जीवन चरित्र पढ़ा जाता है.
पैंसठ वर्ष के श्रावकों ने उसे कम से कम पचास बार सुन लिया होगा.

जीवन चरित्र किसलिए पढ़ा जाता है?
“उनके जीवन से प्रेरणा  (inspiration) लेने के लिए.”

“शंका”
परन्तु हमारे साधू (jain monk) तो ये कहते हैं कि इसे सुनने से बड़ा लाभ होता है?

उत्तर:
आदमी “सुनता” वही  है जिससे उसे
१. लाभ हो
२. आनंद आता हो.
३. “बात” करके टाइम पास करना हो
४. जबरदस्ती भी हो.
(जैसे ऑफिस में बॉस की सुननी पड़ती है – सुनते इसलिए हैं कि वहीँ से तो “घर” का खर्चा चल रहा है)

पहले हमें उत्तर देना पड़ेगा कि हम धर्म स्थान जाते किसलिए जाते हैं.

अरे! कहा ना! लाभ के लिए जाते हैं.
“बहुत अच्छा”
तो फिर “गुरु” जो कहते हैं, उसमें से अपनाने की “तैयारी” कितनी है?
…..मौन….मुझे तो कुछ याद ही नहीं रहता कि गुरु कहते क्या क्या हैं.

हम में से ज्यादातर ने ये समझ लिया है कि “व्याख्यान” सुनने से पुण्य की प्राप्त होती है.
पुण्य प्राप्त होता है, इसमें कोई शंका नहीं है.
पर सुनने से जो पुण्य  “प्राप्त” हुवा है,
उसे “घर” ले जाएंगे कैसे?
“धर्म” को वास्तव में अपनाएंगे

तब  “पुण्य” को “घर” ले जाने की “एलिजिब्लिटी” (eligibility) आएगी.