“चैत्य-वंदन”

हर जैनी को
“चैत्य” (JAIN TEMPLE) और
“चैत्य-वंदन”
की महत्ता (IMPORTANCE) जरूर समझ लेनी चाहिए.

PART – 1
एक श्रावक जब मंदिर में प्रवेश करता है तक सबसे पहले मंदिर की व्यवस्था को देखता है और कुछ भी अव्यवस्थित हो, तो उसे व्यवस्थित करने की जिम्मेवारी भी उसी की है.
PART – 2
बाद में वो “जिन-प्रतिमा” की पूजा इस प्रकार करता हैं मानो “महोत्सव” (FESTIVAL) मना रहा हो.
PART – 3
अब वो भगवान् के सामने “चैत्य-वंदन” करता है – अपने भाव से.
भाव में लीन होकर वो अपनी आत्मा को उसी में समाहित कर लेता है.

चैत्यवंदन में विशेषत: “नमुत्थुsणं” सूत्र आता है.

(कुछ सम्प्रदाय जिन प्रतिमा पूजन का  निषेध करते हैं. जबकि इस बात को प्रमाणित करने के लिए उनके पास कोई प्राचीन शास्त्र नहीं हैं. उनकी महज एक “मान्यता” है  कि जैन मंदिर में पूजा करने से घोर आशातना होती है).

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