करेमि भंते!-5

पहले करेमि भंते!- भाग 1,2, 3 और 4 अवश्य पढ़ें.

“सामायिक” एक विधि (Method) है “

१. मन को वश में रखने की
२. बोली को वश में रखने की
३. “शरीर” को वश में रखने की

जिसका अपने मन पर “वश” है, वो सभी को “वश” में कर लेता है. उसे और कोई साधना करने की जरूरत नहीं है. मन को वश में करना ही सबसे बड़ी साधना है.

 

जिसका अपनी वाणी पर “अधिकार” है यानि “वाणी” उसके खुद के “वश” में है, वो पूरे संसार पर राज्य करता है. जितनी भी “आज्ञा” वो देता है, वो वाणी से ही तो दी जाती है.
जन्म कुंडली में धन, कुटुंब और वाणी का स्थान एक ही होता है.
जो “कम” बोलता है, उसे “इनकम” ज्यादा होती है, ( प्रत्यक्ष उदाहरण:सॉफ्टवेयर इंजीनियर) “ज्यादा बोलने” वाले के पास “ज्यादा धन” नहीं रहता. कुटुंब से मतभेद भी “ज्यादा” बोलने वाले के होते हैं, इसलिए उसे कुटुंब का सुख भी नहीं मिलता. मतलब “वाणी” का “संयम” रखना बहुत जरूरी है. “सामायिक” इस बात की गारंटी देती है कि व्यक्ति तरीके से बोलना सीख जाएगा.

सामायिक में “शरीर” की कोई “देखभाल” नहीं की जाती.

 

“शरीर” को मात्र “साधन” समझकर “साधना” के लिए उपयोग में लाया जाता है. जो “शरीर” की देखभाल में लगे हैं, वो जरा “मरे हुवे” आदमी के पास थोड़ी देर बैठ कर चिंतन करे कि क्या वास्तव में  शरीर को हरदम नए (Latest Brand) कपड़ों की जरूरत है? अच्छे खाने (Chinese Food) की जरूरत है?  गाडी  के नए मॉडल (Latest Model) की जरूरत है? मान सम्मान की जरूरत है?, इत्यादि. एक क्षण पहले जिस जिस चीज की जरूरत थी, वो अब क्यों नहीं नहीं रही?

इससे सिद्ध क्या हुआ?

इससे सिद्ध ये हुआ कि “आत्मा” नाम का तत्त्व “शरीर” से जा चुका और वो व्यक्ति “फ़ोकट” (in vain) में ही जीवन भर “जाने” से पहले तक “शरीर” को “सजाने “में  लगा रहा. 

मरते समय भी “इच्छाए” छूटती नहीं हैं.  

 

यही कारण है कि मरने के बाद भी “शरीर” को नहलाया जाता है, बाल काटे जाते हैं और अच्छा कपड़ा भी पहनाया जाता है ताकि मरते समय ये इच्छाएं बाकी रही हों, वो भी पूरी हो जाएँ.  मान सम्मान में ढेरों मालाएं भी पहनाई जाती हैं और वो भी उस शरीर को, जिसे आधें घंटे बाद जला दिया जाना है.

परन्तु ये सब “लोक-व्यवहार”(Custom) है,
इससे “आत्मा” को कुछ भी “हासिल” (gain) नहीं होता.

(“मुर्दे” को राम-नाम सत्य है का “नारा” लगाने वाले कुछ लोग तो आजकल श्मशान में ही चाय तक पी लेते हैं, राजनीति की बात कर लेते हैं, ये भी अनुभव किया है कि अपने CA से इनकम-टैक्स केस के बारे में भी डिस्कशन करने का मौका चूकना नहीं चाहते और ये भी देखा गया है कि चिता में अग्नि देते समय यदि मोबाइल फ़ोन बजे, तो उसे “रिसीव” करने में उन्हें  हिचक नहीं होती – ये है “समाज” का “नंगा चित्रण” जिसे “व्यक्ति” अपना समझ कर जीवन भर “दौड़ता” है).

इतना सब जान लेने के बाद भी यदि किसी को अपने “शरीर” का  “ममत्व” ना छूटे तो वो ना तो “सामायिक” के “महत्त्व” को समझ सकता है और ना ही “आत्मा” नाम के “तत्त्व” को समझ सकता है.

 

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