अहो जैन धर्म – संघ ही सर्वोपरि है!

अंतिम श्रुत केवली (चौदह पूर्वधर) श्री भद्रबाहु स्वामी नेपाल में “महाप्राण” की “साधना” कर रहे थे. महाप्राण की साधना करने से “चौदह पूर्वों” का पुनरावर्तन (Revision) करने की शक्ति एक मुहूर्त में आ जाती है. (एक ज्ञानी  को भी अपने ज्ञान की “संभाल” रखने के लिए Revision की आवश्यकता होती है – ये इसका प्रमाण है).

भयंकर दुष्काल के कारण काफी श्रुत ज्ञान अव्यवस्थित हो चुका  था. इसलिए वीर निर्वाण के 160 वर्ष पर पाटलिपुत्र (पटना) में श्री स्थूलिभद्र के नेतृत्व में एक महासम्मेलन हुआ. सभी ने मिलकर 11 अंगों का पूर्णतः संकलन किया. “दृष्टिवाद” जैन आगमों का बहुत महत्त्वपूर्ण भाग है और इसका संकलन किये बिना 11 अंगों की वाचना अधूरी थी.

 

उस समय “दृष्टिवाद” के एकमात्र ज्ञाता थे : श्री भद्रबाहु स्वामी.
संघ ने कुछ श्रमणों को उनके पास भेजा. आयुष्य में कमी और “महाप्राण साधना” में लीन होने के कारण   उन्होंने आने में असमर्थता प्रकट की और साथ में किसी को वाचना देने में भी अपनी अस्वीकृति दी.

संघ ने उन्हीं  से पूछा :
भगवन- “संघ” की अवज्ञा का क्या दंड आता है?
भद्रबाहु स्वामी ने कहा:
वो संघ से बहिष्कृत करने के योग्य है!
संघ ने कहा:
“तब तो आपको भी….”

 

“आचार्य” जी को अपनी भूल का “ज्ञान” हुआ.
(चौदह पूर्वधर होते हुए भी एक जीव “भूल” कर सकता है और जिस “संघ” में एक व्यक्ति को भी “उत्कृष्ट” ज्ञान ना हो फिर भी संघ “भूल” निकालने का अधिकारी है ).

तब उन्होंने “स्थूलिभद्र” को वाचना देना स्वीकार किया.

 

विशेष:
तीर्थंकर भी अपनी देशना देने से पहले “नमो तित्थस्स” कहकर चतुर्विध संघ को नमस्कार करते हैं.
(इसकी जानकारी के लिए अन्य पोस्ट पढ़ें).

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