गर्व से कहो हम जैन हैं!

1. भगवान् महावीर ने जैन शासन की स्थापना की थी

किन्तु कालान्तर में मत मतान्तर के कारण जैन शासन कई फिरको में बंट गया

जैसे श्वेताम्बर दिगम्बर स्थानकवाशी तेरापंथी आदि

कई फिरके विद्यमान है तो

मैं कौन से जैन कहलाने पर गर्व करू?

शंका निवारण :

सभी जैन ही हैं, जिस प्रकार एक को हलुवा अच्छा लगता है और एक को मिर्ची बड़ा, पर खाने में मजा तो दोनों को ही आता है. इसी प्रकार “विधि” चाहे कुछ हो, यदि वो “महावीर” के झंडे के नीचे हैं, तो जैन ही हैं.

 

2. कई बार अलग -अलग दिन संवत्सरी मनाते है,

वर्षी तप का पारणा भी अलग अलग दिन करते है

तो मैं कोन दिन मनाने वाले जैन पर गर्व करू?

शंका निवारण :

संवत्सरी शाश्वत नहीं है. ओली जी शाश्वत है. इसीलिए किस दिन क्या मनाएं, ये महत्त्वपूर्ण नहीं है. जैनों के लिए तो रोज ही “संवत्सरी” होती है क्योंकि वो हर दिन प्रतिक्रमण करते समय “क्षमापना” करते हैं सभी जीवों से.

 

3. सभी जैन महावीर के अनुयायी होते हुए भी
श्वेताम्बर और दिगम्बरो में मालकियत के झगडे में
अन्तरिक्ष पार्श्वनाथ भगवान अपूजित अवस्था में है,
करोड़ो का खर्चा कोर्ट कचहरी में दोनों पक्षों की तरफ से हो रहा है,
भगवान कैद खाने में पड़े है
उसे देखकर हमारा दिल रो पड़ता है और आत्मग्लानि भी होती है
कि दोनों सम्प्रदाय के आराध्य देव एक होने पर भी झगडे में अपूजित है,
भयंकर आशातना हो रही है
तो मैं कौन से जैन होने पर गर्व करू?
शंका निवारण :
दोनों ही पंथ ये समझ रहे हैं कि वे “भगवान” के “मालिक” हैं
और दूसरी तरफ चिल्ला चिल्ला कर कहते हैं कि
“भगवान” ही तीन जगत के नाथ (“मालिक”) हैं.
 
समाज के कुछ ठेकेदारों और संतों की सोच पर तरस आता है.
हर श्रावक के लिए तो “भगवान” पूजनीय ही है,
वो तो स्वयं को भगवान का “दास” समझते हैं.
इसीलिए श्री संघ ही महान हैं,
जो लड़ रहे हैं धर्म के नाम पर;
वो कितने “धर्मी” हैं
इसका निर्णय श्रावक करें.
एकदम सरल और सीधा निवारण :
छ: महीने के लिए दिगंबर इस प्रतिमाजी को अपनी विधि से पूजें और छ: महीने के लिए श्वेताम्बर इस प्रतिमाजी को अपनी विधि से पूजें, ऐसा समझौता   करें, तो कचहरी में से केस आज ही उठ जाएगा.   इससे दोनों सम्प्रदायों में आपस का समन्वय भी बढ़ेगा. 

 

4. जैन धर्म में रात्रि भोजन निषेद्ध है
तो भी शादी पार्टियो में सामूहिक रात्रि भोजन करते है और करवाते है,
कही कही हम जैनों में भोजन में कंद मूल की वानगी भी बनाते है
तो में कौन से जैन होने पर गर्व करू?

शंका निवारण :

इतना होने पर आज भी लोग अट्ठम, अट्ठाई, मासखमण और वर्षीतप, इत्यादि करते हैं, क्या ये कम आश्चर्यजनक है?
 
5. जैनों में वर्जित कई प्रकार के धंदे( गुटका बेचना, दारू बेचना, ड्रग बेचना,जिसके खाने पिने से व्यक्ति खत्म हो जाता है और परिवार दुखी होता है ),या अनीति कर,
करोड़ो कमाकर दान देने वाले जैन पर कैसे गर्व करू?
शंका निवारण :
कुछ “नीच” लोग समाज का प्रतिनिधित्त्व नहीं कर सकते. सभी ऐसे नहीं हैं. हां, जैनों में जागृति लाने की आवश्यकता जरूर है. Jainmantras.com इस दिशा में एक प्रयास है.
 
6. प्रतिष्ठा आदि धार्मिक अनुष्ठानो में महँगी महेंगी प्रत्रिकाओ में
भगवान के फोटो गुरुओ के फोतो छपवाते है,
फिर वही मंदिर परिसर में पधरा देते है या रद्दी में बेच देते है
जिससे आशातना होती है
तो जैन होने पर कैसे गर्व करू?
शंका निवारण :
“नाम” की “भूख” श्रावकों में है और संतों में भी है, वो छद्मस्थ हैं यानि केवलज्ञानी नहीं हैं, “ज्ञान” को “स्पर्श” करने की “चेष्टा” कर रहे हैं. जिस दिन उनमें भी “ज्ञान” प्रकट होगा, ऐसा करना स्वयं छोड़ देंगे.

 

7. जैन स्कूल और कॉलेज नहीं बनाते और जैनों के करोड़ो रूपये डोनेशन के नाम पर इंग्लिश स्कूलों में जाते है तो कौन से जैन होने का गर्व करू?

शंका निवारण :
जिस दिन ये कार्य हो गया, समझ लेना बहुत बड़ा कार्य हो गया. धर्म की “शिक्षा” ही सच्चा ज्ञान है. वर्तमान एजुकेशन “धन” कमाने का साधन समझी जाती है और है भी. इसलिए इसे  नज़रअंदाज नहीं कर सकते. दोनों के समन्वय की जरूरत है.
इसमें सबसे बड़ी बात है – पैसे वाले पैसा देकर “शिक्षण-संस्थाओं” में “कायम ट्रस्टी” बनना चाहते हैं. मात्र पैसा लगाने से तो आज बिज़नेस भी नहीं चलाया जा सकता, शिक्षण तो बहुत दूर की बात है.
ऊँची शिक्षा देने के लिए ऊँचा ज्ञान चाहिए. जिस दिन बड़े श्रावकों से घिरे साधू-संत उन्हें “सही शिक्षण” दे सकेंगे, उसी दिन से “जिन-धर्म” की सच्ची प्रभावना होगी.
 

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