एक निवेदन:
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कल की बात ने पूरी तरह झकझोर दिया है
कि “जैन मंत्र” कमजोर पड़ते हैं.

हकीकत में “साधना” में कमी है.
“अरिहंत” कुछ नहीं करते,
ये भी मन में बैठा हुआ है.

(उनके प्रभाव को साधुओं ने स्वयं अनुभव नहीं किया,
श्रावक अब क्या करें, कहाँ जाएँ).

वास्तविकता :
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श्रावकों के पास

१ नवकार,
२ लोगस्स,
३ नमुत्थुणं,
४ उवसग्गहरं,
५ लघु शांति,
६ ऋषिमण्डल,
७ भक्तामर,
८ तिजयपहुत्त,
९ चिंतामणि पार्श्वनाथ स्तोत्र,
१०. मंत्राधिराज पार्श्वनाथ स्तोत्र,
११. घंटाकर्ण कवच,
१२. पद्मावती कवच,
१३. बटुक भैरव देव स्तोत्र,
१४.आत्म रक्षा स्तोत्र, इत्यादि
अनेक सुलभ स्तोत्र हैं.

परन्तु हो ये रहा है :
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पंचान्हिका या अष्टान्हिका महोत्सव में
एक एक दिन अलग अलग स्तोत्र का महापूजन हो रहा है.

ये महापूजन उपसर्ग रोकने में समर्थ है,
इसमें कोई शक नहीं है.

परन्तु प्रश्न ये है क्या “श्रावकों” को महापूजन में
“टिक” कर बैठना पसंद है?

(साधू भी टिक कर पूरी देर नहीं बैठते,
थोड़ी देर के लिए पधारते हैं,

तब ऐसा लगता है कि उनके लिए दूसरे काम ज्यादा महत्त्वपूर्ण हैं
– ये बात श्रावकों को क्या सन्देश देती है
– जरा चिंतन करें).

दूसरी ओर:
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एक दिन की जो “साधना” करवाई जा रही है,
उससे प्राप्त क्या हो रहा है?

हाँ, एक “चेतना” जरूर आ रही है.
पर “उस” एक दिन के बाद?
“वो” चेतना कहाँ जाती है?

सार:
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“साधना” वो है जो आप स्वयं कर सको.
“पूजन” वो है जो आप स्वयं कर सको.
“भक्ति” वो है जो आप स्वयं कर सको.

(आप “सिर्फ” तालियां बजाने के लिए नहीं हो).

जैन धर्म में हर श्रावक को ये “व्यक्तिगत” अधिकार है.
इस बारे में “चेतना” लाने की जरूरत है.
तभी जैन धर्म के प्रति हम अपना “दृढ़ विश्वास” ला सकेंगे.

विशेष:
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अनेक श्रावक ओर श्राविकाएं स्वयं “साधक” बनें,
इस बात का “आह्वान” करता हूँ.

रोज सिर्फ एक घंटा “साधना” के लिए निकालें.
(एकदम सवेरे या रात को)

अपने सम्यक्त्व को सुरक्षित रखते हुवे
अनेक समस्याओं से छुटकारा पाएं
और “समृद्धि” को भी प्राप्त करें.

१ धक्के खाने से बचना है तो,
२ पैसों की बर्बादी से बचना है तो,
३ धर्म के नाम पर वाद-विवाद से बचना है तो,
४ घर में परम शांति रखनी हो तो,
५ घोर संकट पास में भी ना फटके ऐसा चाहते हों तो,

हर जैनी अपनी “पात्रता” को पहिचाने
औऱ एक “साधक” बनें !
फिर चाहे भाई हों या बहिनें !

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