जैन संघ की एकता

“धर्म” की क्रियाओं को लेकर जैन संघ में एकता नहीं हो सकती क्योंकि सभी धर्माचार्यों की वेशभूषा एक सी नहीं है. यहीं से अनेकता प्रकट होती है.
जबकि “संघ” में श्रावकों की वेशभूषा एक ही होती है, उनकी वेशभूषा को देखकर कोई ये नहीं कह सकता कि ये “फलाने” सम्प्रदाय को मानने वाला है.
आजकल पूरे व्याख्यान में “महावीर” शब्द भी सुनाई नहीं देता.  व्याख्यान देने के लिए जैन  साधू के लिए ये विधान है कि “शास्त्र” सामने रखे और तीर्थंकरों की वाणी ही संघ को सुनाये.

 

लोगों को ये लगता है कि ये शास्त्र तो हम बहुत बार सुन चुके, बार बार वही सुनने पर कोई “आकर्षण” महसूस नहीं होता.

अब इस “समस्या” का निदान क्या है?
१. खुद ही “चिंतन” का विकास करना.
२. धर्मसभा में धर्म सम्बन्धी “प्रश्न” पूछना
(ये तो बड़ी समस्या है, लोग तो “अपनी” समस्या का निवारण “धर्म” से करना चाहते हैं).
३. “श्लोक” को मात्र रटे नहीं, उसका अर्थ जानें और फिर भावार्थ.
और इसके बाद के “विकास” की कड़ी है : “शब्द” का “विस्तार”

 

प्रश्न:
इन सब बातों को “जैन एकता” से क्या सम्बन्ध है?
प्रति प्रश्न:
इन सब बातों को “जैन एकता” से सम्बन्ध कैसे नहीं है?
उत्तर:
सबसे पहले “एकता” का महत्त्व समझना होगा.
लोगों के समूह को “धर्म संघ” तब तक नहीं कहा जा सकता जब तक वो किसी न किसी विषय पर “एक मत” ना हो.
“भीड़” को “संघ” नहीं कहा जा सकता.
“टोले” को भी “संघ” नहीं कहा जा सकता जो थोड़ी देर के लिए प्रसंगवश इकट्ठा हुआ हो.
“दो-चार” व्यक्तियों के समूह को भी संघ नहीं कहा जा सकता.
“विभिन्न” विचारधारा वाले लोग एक जगह बैठे हों, उसे भी संघ नहीं कहा जा सकता.

 

प्रश्न:
जैन धर्म में आज “चार” फिरके हैं, किसी प्रसंगवश वो एक जगह बैठे हों,
क्या उसे संघ कहा जा सकता है?

चिंतन करके उत्तर आपको देना है.

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भंवरलालजी दोशी
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