धर्म क्या है-भाग 5

श्री जिन भट्ट्सुरीजी से श्री हरिभद्र ने जाना कि धर्म है :“भव-विरह” का मार्ग,
यानि जैन धर्म के अनुसार – जन्म मरण से छुटकारा पाने का जो रास्ता है, वो “धर्म” है.

एक भिखारी मंदिर के बाहर बैठता है.
मंदिर “आने-जाने” (सही में “दर्शन” कितने कर पाते हैं, नहीं पता) वाले लोगों से “ज्यादा” देर तक वो मंदिर के बाहर बैठता है.
मतलब बहुत सारे लोग दिन-भर आते हैं -“धर्म” को अपनाने के लिए.
पर हकीकत क्या है?
जरा देखें.

 

मंदिर के बाहर बैठने वाला भिखारी मंदिर के बहुत पास होकर भी “मंदिर” में नहीं जाता.
क्यों?
क्योंकि उसकी “बुद्धि” बस इतनी है कि मंदिर के बाहर ही “भीख” मिल रही है, तो फिर अंदर क्यों जाने का?
“मंदिर” में दर्शन करके क्या प्राप्त करना है उसे नहीं पता.
क्या मंदिर के रोज “दर्शन” करने वाले को पता है कि वो “दर्शन” करके क्या प्राप्त करता है?

जैन धर्म पहली बात करता है “दर्शन” की!
“दर्शन” यानि “सम्यक् दर्शन!”
ऐसे महापुरुष की प्रतिमा के नित्य दर्शन जिसे ना कोई राग है ना कोई द्वेष.

 

“दर्शन, ज्ञान और चारित्र” के “त्रिक” में पहला नंबर “दर्शन” का है.
जैन धर्म के बारे में जानने का हमारा एक स्टेप यहाँ पूरा हुआ.

मंदिर के बाहर ही बैठा हुआ “भिखारी” मंदिर में नहीं जाता इसलिए उसे “दर्शन” भी नहीं हो पाते.
कहने का मतलब वो मंदिर के इतने पास में बैठा है कि जो लोग दर्शन करने आते हैं,
उन्हें  “भिखारी” के दर्शन  पहले होते हैं.
इसके लिए जिम्मेवार वो खुद हैं. क्योंकि वो ये मानते हैं कि इससे “पुण्य” प्राप्त होता है.  “दुआ” दिल से ही दी जाती है पर “भिखारी” के पास तो “दिल” ही नहीं है.
यदि मंदिर के बाहर बैठे हुए “भिखारी” का “आशीर्वाद” उन्हें “फलता” है तो फिर “मंदिर” में जाने की जरूरत ही कहाँ है? दोनों का काम बाहर ही हो रहा है. भिखारी को भीख मिल रही है और उसे “दान” देने वालों को पुण्य!
आगे पढ़ें: धर्म क्या है-भाग 6

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