धर्म क्या है?-भाग-4

पहले पढ़ें: धर्म क्या है?-भाग-3(नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें).

पूर्व भूमिका:
राज्य के राजपुरोहित होते हुवे भी श्री हरिभद्र का प्रश्न था : “धर्म” क्या है?……??…..??

पाठकों के सामने एक प्रश्न :
इस श्लोक के अर्थ को जानने से श्री हरिभद्र को क्या मिला?

“धर्म” क्या है?
इसका उत्तर श्री जिणभट्टसूरीजी ने दिया:
“धर्म” वह है जिससे “जन्म-मरण” से छुटकारा मिले- भव विरह!

 

तब श्री हरिभद्र ने कहा:
तब तो मुझे “धर्म” ही प्रिय है.

(एक मिनट पहले पता नहीं था कि “धर्म” क्या है (खुद राज दरबार के राजपुरोहित!) और जैसे ही जाना कि “धर्म” जन्म-मरण से “छुट्टी” दिलाता है तो तुरंत ही उसे स्वीकार किया. यही तो “चमत्कार” है).
जरा गौर से उस स्थिति की कल्पना करें. मानो कि हम ही बैठे हैं गुरु के पास. अभी तक हमें धर्म का पता नहीं था कि “धर्म” क्या है? अब उसे जान भी लिया तो क्या करने कि तैयारी है? अपनाने की है? या “भव विरह” को सुनकर वापस “भव भ्रमण” में ही स्थित हो जाना है?

अरे! श्रावक धर्म जन्म से मिला, क्या वास्तव में “स्वीकार” किया है?
इस  बारे में नीचे लिखी पोस्ट पढ़ें.

http://jainmantras.com/%E0%A4%B6%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%B5%E0%A4%95-%E0%A4%8F%E0%A4%95-%E0%A4%9C%E0%A5%88%E0%A4%A8-%E0%A4%AE%E0%A5%81%E0%A4%A8%E0%A4%BF-%E0%A4%95%E0%A4%BE-baby-version-%E0%A4%B9%E0%A5%80/

 

जैन धर्म की “गहराई” अच्छे अच्छे आचार्य भी “पूरी तरह” नहीं जान पाये तो हम क्या “चीज” हैं?
दीक्षा लेने के बाद श्री हरिभद्रसूरी जी ने 1444 ग्रन्थ लिखे पर हर बार अपने को “अल्पमति” (कम बुद्धि वाला) घोषित किया है. क्या इतने बड़े आचार्य “झूठ” बोलते हैं? यदि ऊँचे भाव भी हैं तो क्या ऊँचे भाव में “असत्य भाषण” करेंगे? तीर्थंकरों के ज्ञान के आगे उन्हें अपने ज्ञान की “लिमिटेशन” का पता है. इसलिए जो कहते हैं, तो सच ही  है. आज कुछ आचार्य अपने श्रावकों को “समवसरण” बनाने की अनुमति देते हैं, श्रावक जो करें, वो उन्हें मान्य करना पड़ता है.  फिर हकीकत में “गुरु” कौन है? जरा विचार करें.

 

जैन धर्म मात्र “अरिहंत वाणी” पर टिका हुआ है. इसे तोड़ मोड़कर तर्क और पूर्वाग्रह के आधार अपनी सुविधानुसार
सूत्रों में फेरफार करना  सही नहीं है, क्योंकि ऐसा वही करता है जो अपने “मत” को ऊपर दिखाना चाहता है.
यदि हमारा मत सिर्फ  “आत्मा के उत्थान”   की ही बात करता है, तो अपने सम्प्रदाय को ऊपर बताने की आवश्यकता ही नहीं रहती, क्योंकि “आत्मा का कल्याण” करना उससे भी बहुत ऊँचा है.

 

पर आज सभी अपने अपने “गुरु” को ऊँचा बताने की होड़ में लगे हुवे हैं. “गुरु” रास्ता (पथ) बताते हैं -जो अरिहंतों ने कहा है, वो बताते हैं और “लक्ष्य” “आत्म-कल्याण” करना है – यही जिन धर्म है.  सोचने का विषय ये है कि जब अपने अपने पथ को ही  सबसे ऊँचा बताएँगे तो “लक्ष्य” को क्या कहेंगे?

सारी पोस्ट्स पढ़ने के बाद निर्णय करें कि क्या ये दोनों प्रश्न अभी भी हमारे सामने खड़े हैं?
1. धर्म क्या है?
2. श्लोक का उत्तर जानने के बाद “हरिभद्र” को क्या मिला?

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