बात मेरी आत्मा से

“अपने आप” को ही “मैं”
अभी तक “समझ” नहीं पाया हूँ.”
– ये विचार तब तक रहता है
जब तक “मैं”
“अपने-आप” को
“देख” ना लूं
“आत्मा” को “देखने” की बात है,
“समझने” की नहीं.

“आत्मा” (soul) की बात तो
आजकल मंच पर बैठकर वो “लोग” भी कर लेते हैं
जिनका “आत्मा” से कुछ “लेना-देना” नहीं है.
(“आत्मा” का वास्तव में
किसी से लेना-देना नहीं है,
वो अच्छी तरह समझ चुके हैं). 🙂

एक नंबर का
“स्वार्थी” ही बनना है तो
“अपने आप” से
“प्रेम” करना सीख लो.

अपनी “साधना” को
वैसे ही “गुप्त” रखें,
जैसे की “धन” को.
विडम्बना ये है कि
आजकल इन दोनों की
ही “शोबाज़ी” सभी करते हैं.

“आत्मा” (soul) “गुप्त” रहती है.
उसे “प्रकट” करने के लिए ही
“आत्म-साधना” (meditation) करनी होती है.
“खुद” की ही “आत्मा”
और
“खुद” से ही “गुप्त” !
कैसा सिस्टम है !

उच्च विचार जिस दिन आने लगें,
समझें – अब उन्नति निश्चित है.

“धर्म” की “पाठशाला” (school of religion) में
हर कोई “पास” भी नहीं होता
और “फ़ैल” भी नहीं होता.

“आत्मा” का “एक्सीडेंट” (accident of “soul)”
“मोक्ष मार्ग” (parth for moksh) को
यदि हमने इस जन्म में नहीं समझा
तो समझ लेना कि
एक तो हम Wrong Side में गाडी चला रहे हैं
और
दूसरा हमने Turn भी गलत दिशा में ले लिया है.
(“आत्मा” का “एक्सीडेंट”
करने की “व्यवस्था” हमने स्वयं कर ली है).

“मुक्ति” का मार्ग
चुनने वाले
अक्सर “बंधन” का
मार्ग चुन लेते हैं.

अपनी “मान्यताओं” (assumptions) में “बंध” जाते हैं.
जानने के लिए बहुत कुछ होता है
पर अपनी “मान्यताओं” से ही
“बाहर” नहीं निकल पाते.

High Voltage Shock:
“जीवन” के “अंतिम” समय में
“यदि” पता पड़े कि
जिन्हें हम मौलिक मान्यताएं समझ बैठे थे
वो तो “किसी” की बनाई हुई थी,
वास्तव में “थी” नहीं,
तो “जीव” की गति कैसी होगी?

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