“अन्नत्थ “प्रतिज्ञासूत्र है.

प्रतिज्ञा वही ले सकता है जो उसे पूरी करने का “आत्म-बल” रखता हो,
हौंसला रखता हो किसी भी कीमत पर उस प्रतिज्ञा को  निभाने का!

“भीष्म-पितामह” की प्रतिज्ञा का  तो नाम ही अब “भीष्म-प्रतिज्ञा” के नाम से जाना जाता है.

“रघुकुल रीत सदा चली आई….” ये हम आज तक सुनते आ रहे हैं.
क्या मात्र “रघुकुल” ही अपने “वचन” के लिए प्रतिबद्ध रहा था?
दूसरे “कुल” का नाम क्यों नहीं लिया जाता?
क्या ये “रीत” हम सभी नहीं अपना पाये?
क्या एक भी “कुल” अब तक नहीं हुआ जो अपने “वचनों” पर “स्थिर” ना रहा  हो यानि की हुई प्रतिज्ञा को उसने तोडा ही हो!

 

ये तो हुई पूर्वभूमिका!
अब जानें कि इस सम्बन्ध में  जैनों की क्या स्थिति है?

बात करते हैं जैन धर्म में की जाने वाली प्रतिज्ञाओं की!
जैन धर्म में “पच्चक्खान” (प्रतिज्ञा) लिए बिना किसी भी “तप” की मान्यता नहीं है.
बिना पच्चक्खान के उपवास किया जाए, तो उसे उपवास का दर्जा ही नहीं दिया जाता.
ये तो “बिना टिकट” लिए यात्रा करने जैसा है.
बिना “एडमिशन” लिए “क्लास” में बैठने जैसा है.

 

बिना प्रतिज्ञा लिए “सामायिक” भी नहीं होती.
पर “सामायिक” लेने से पहले  “अन्नत्थ” सूत्र आता है.
और उससे भी  पहले “तस्स उत्तरी करणेणं” सूत्र आता है.
और उससे भी पहले भी “इरियावहिया” सूत्र आता है,

पूरा सिस्टम है –
पहले सामायिक लेने के भाव का,
फिर प्रतिज्ञा करने का और वो भी “गुरु” के सामने,
फिर “इरियावहिया” सूत्र से किये हुवे पापों को एक एक करके याद करने का (जो याद नहीं हैं उन्हें भी “भाव” से याद करने का),
फिर “पाप से मुक्त” होने की बात ..”तस्स उत्तरी करणेणं” से
और फिर “अन्नत्थ सूत्र” से अपने शरीर और आत्म  बल की शक्ति के अनुसार “ध्यान” की “मर्यादा” स्वयं निश्चित करना और फिर “कायोत्सर्ग” करना!

 

प्रश्न:   
क्या ये “प्रतिज्ञाएँ” हर कोई ले सकता है?
उत्तर:
सिर्फ “जैनी” ही ये प्रतिज्ञा ले सकता है.
और इसलिए जिनशासन में एक चार साल का बच्चा भी जब तीन उपवास करता है तो “पच्चक्खान” सहित!

क्या कारण है इसका?
“जैन” जन्म से “क्षत्रिय” कुल में पैदा होते हैं.
“शूरवीरता” उनकी “नसों” में भरी पड़ी है.
“तीर्थंकरों” का “पुण्य” और “गुरुओं” का “आशीर्वाद” इसमें सहभागी बनता है.

 

अब बताएं कि जैनों को जो सामायिक सूत्र दिए गए हैं
वो क्या किसी चमत्कार से कम हैं?

और जानने के लिए २०१६ में प्रकाशित होने वाली पुस्तक पढ़ें: जैनों की समृद्धि के रहस्य

अन्नत्थ सूत्र

अन्नत्थ-ऊससिएणं, नीससिएणं, खासिएणं, छीएणं, जंभाइएणं,
उड्डुएणं, वाय-निसग्गेणं, भमलीए, पित्त-मुच्छाए………………. .1.

सुहुमेहिं अंग-संचालेहिं, सुहुमेहिं खेल-संचालेहिं,
सुहुमेहिं दिट्ठि-संचालेहिं. ………………………….…………………. .2.

एवमाइएहिं आगारेहिं, अ-भग्गो अ-विराहिओ,
हुज्ज मे काउस्सग्गो. ……………………………………………..…. .3.

जाव अरिहंताणं भगवंताणं, नमुक्कारेणं न पारेमि……..…………. .4.

ताव कायं ठाणेणं मोणेणं झाणेणं, अप्पाणं वोसिरामि………….…. .5.

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