और भी घूमना बाकी है?

और भी घूमना बाकी है?
पढ़ कर विचार करना.

हम सभी “जीव” अनन्त काल से भ्रमण करते आये हैं.
“भ्रमण” करने की (घूमने फिरने की) ये “इच्छा” हमारी अभी भी पूरी नहीं हुई है.

1. हवाई सफर करने का शौक है हमें
जबकि अनन्त बार “वायु” के जीव बने हैं हम !

2. ऊंचे ऊँचे पहाड़ पर चढ़ने का शौक है हमें
जबकि अनन्त बार “पृथ्वीकाय” के जीव बने हैं हम !

3. नौका विहार और “वाटर फाल्स” देखने का शौक है हमें
जबकि अनन्त बार “पानी” के जीव बने हैं हम !

4. पटाखे-आतिशबाजी करने का शौक है (शादियों पर) हमें
जबकि अनन्त बार “अग्नि” के जीव बने हैं हम !

5. हरियाली (ग्रीनरी) देखने का शौक है हमें जबकि
अनन्त बार “वनस्पति काय” के जीव बने हैं हम !

मतलब ऊपर जो जो लिखा है, वो अनन्त बार हम खुद बन चुके हैं और अब भी वहीँ जाने की इच्छा है.

ये चीजें अच्छी लगती हैं क्योंकि पूर्व भव में “इनके जैसे” (पहाड़ यानि पृथ्वीकाय के जीव इत्यादि) होने के संस्कार हमारे रोम-रोम में भरे पड़े हैं.
और ये “रोमिंग” की प्रक्रिया अभी भी चालू है.

इनसे मिलना मतलब पूर्व भव के अपने “उन साथियों” से मिलना
जो अभी पृथ्वीकाय बने हैं यदि हमारी इच्छा पहाड़ों पर जाने की है.
आगे भी इसी तरह समझ लेना.

अब भी यदि नहीं समझे तो आगे और अनन्त काल तक खूब रोना पड़ेगा.
और
यदि अभी ही समझ में आ गया तो फूट फूट कर अभी ही रोने लगोगे.
(आगे रोना नहीं पड़ेगा).

? महावीर मेरा पंथ ?

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