जो तपस्वी हैं,
उनकी अनुमोदना की जाने की बात
जैन शास्त्रों में है.

जिसने तप को “पकड़” लिया है,
तो उसके लिए तप करना कठिन नहीं है.

यदि तप करना हमारे बस में नहीं है,
तो भी जैन धर्म में ऐसी व्यवस्था है कि
आप तपस्या न करके भी उसका फल पा सकते हो.

इसलिए तप करना,
यदि हमारे बस में नहीं है,
तो जबरदस्ती उसकी जरूरत भी नहीं है.

शास्त्रीय रूप से धर्म क्रिया वही मान्य होती है जिसमें हमारा चित्त लगे, न लगे तो लगाने की चेष्टा करे.

जैन धर्म के अनुसार सभी को तप करना अनिवार्य नहीं है, सभी इस बात को अच्छी तरह समझ लें.

मात्र “अरिहंत” शब्द को दिन में
600 बार गिनने से
एक उपवास का फल प्राप्त होता है.

विशेष :
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कभी 8,11,15,30 आदि की तपस्या की हो
और आज रात्रि भोजन करते हों,
कन्द मूल शौक से खाते हों,
उन्हें ये छूट कहाँ से मिली? ?

ऐसी तपस्या की favour करने वाले अधिक हैं,
वो कहते हैं कम से कम की तो सही,
नहीं तो ये भी नहीं होती.

ये कम से कम वाली थ्योरी को बिल्कुल हटा देने की बात है, ये कोई काम की नहीं है यदि धर्म के बेसिक संस्कार चित्त में न बसे हों.

तप कोई व्यवहार निभाने के लिए नहीं किया जाता,
आत्म शुद्धि के लिए किया जाता है.

यदि व्यक्ति को घूम कर आना अपनी आदतों पर ही है, तब ऐसे तप सिर्फ लोगों को अपना रिकार्ड दिखाने के काम आते हैं.

तप का मूल उद्देश्य अपनी आत्मा को आगे की ओर ले जाना है, यदि व्यक्ति को अपनी आदतें ही छोड़नी न हों, तो किए गए तप की कितनी उपयोगिता है?


? महावीर मेरा पंथ ?
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