तीर्थ स्थानों के सौंदर्य से पुण्य अर्जन और शुद्धिकरण

जैन तीर्थ स्थल “पुण्य” प्राप्त करने के सागर है, जिन्हें संसार में अभी भी रहना है.
जैन तीर्थ स्थल “मुक्ति” प्राप्त करने के द्वार भी है, जिन्हें संसार में नहीं रहना है.

“अन्य क्षेत्रे कृतं पापं, तीर्थ क्षेत्रे विनश्यति
तीर्थ क्षेत्रे कृतं, वज्रलेपो भविष्यति ||”

पुराने समय से परिवार सहित “घूमने” के लिए तीर्थस्थानों की रचना की गयी है.ताकि पुण्य भी कमाए और फ्रेश भी हो जाए. 
इसीलिए आज भी “संघ” के साथ तीर्थस्थानों के दर्शन का आयोजन किया जाता है.

वर्तमान में जिनके पास “Purchasing Power” है, वो लगभग हर दो-तीन महीने “घूमना” चाहते हैं.
Top Class Hotels में रूकना मतलब हर जगह पैसा पानी की तरह बर्बाद करना है और मुफ्त में “पाप” बाँध कर घर पर लाना है.

 

ट्रैवलिंग में मनुष्य पाप कैसे बांधता  है :-

१. “धर्म” करने के स्थान पर “सारे”पाप व्यापार खुल जाते है.
२. रात्रि भोजन बड़े “ठाठ” से होता है इसलिए उतने ही “ठाठ” से ही “पाप” भी बांधता है.
३. “समुद्र” में नहाने के “मजे” लेकर “मजे” से “कर्म” बांधता है – तेउकाय (पानी के जीव) भी बनना पड़  सकता है स्वयं को.
४. “ठंडी” हवाओं के “झोंके” लेकर “झोंक” में खुद अपने लिए आने वाले भव में “वायुकाय” बनना भी तय कर लेता है.
५. “हरियाली” की खूब प्रशंसा करके खुद अपने लिए आने वाले भव में “वनस्पतिकाय” बनना भी “पसंद” कर लेता है.
६. “माउंटेन्स” की प्रशंसा करके खुद अपने लिए आने वाले भव में “पृथ्वीकाय” बनना भी “पसंद” कर लेता है.

 

अब भी किसी की हिम्मत है तो जहाँ तीर्थ स्थान नहीं है, वहां के  नदी, पर्वत, हरियाली इत्यादि की प्रशंसा कर ले और “बड़े प्रेम” से आने वाले “भव” में “वहीँ” बसने की तैयारी कर ले!

जिन्हें तीर्थ-स्थानों में भी “रात्रि-भोजन” किये बिना “चैन” नहीं पड़ता,
उनके लिए ठीक ये है कि वो “होटल्स और हिल स्टेशन” पर ही रुकें.
क्योंकि:
तीर्थ स्थानों में आकर “पाप” धोये जाते हैं, नए बांधे नहीं जाते.
जो तीर्थ स्थानों में आकर “पाप” बांधते हैं, वो “वज्रमय” हो जाते हैं.

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