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दादा भगवान और “अक्रम” विज्ञान

दादा भगवान ( मूल नाम : अम्बालाल पटेल)

जिन्होंने “अक्रम विज्ञान” (जय सच्चिदानंद संघ)

की स्थापना की,

उन्हें सूरत के रेलवे स्टेशन पर

“आत्म-ज्ञान” (“सेल्फ-रेअलिज़ेशन”)

आज से लगभग ५५ वर्ष पहले हुआ.

उन्होंने सूरत से लगभग १८ किलोमीटर दूर “कामरेज” हाईवे पर

श्री सीमंधर स्वामी का अद्भुत मंदिर बनवाया है

जिसमे मंदिर के साथ बायीं ओर शिवजी का  मंदिर

और दायीं ओर कृष्णजी का मंदिर बनवाया है.

(वो खुद “कांट्रेक्टर” थे).

 

सर्व धर्म “समन्वय” की “मान्यता”

इस मंदिर के द्वारा यहाँ  प्रकट करने की कोशिश की है,

परन्तु वर्तमान में

महाविदेह क्षेत्र  में  विचरण करने वाले

श्री सीमंधर स्वामी की प्रतिमा की

ऊंचाई बहुत ज्यादा रखी है

जो जैन धर्म की प्रभावना करती है.

इस प्रतिमाजी की ऊंचाई मेहसाना (गुजरात) के

श्री सीमंधर स्वामी की प्रतिमा की से मात्र

१.५ इंच छोटी जानबूझकर रखी है

क्योंकि वो मंदिर पुराना है.

 

(ये इस बात का भी प्रतीक है कि उनमें अहंकार नहीं रहा.

(बाकी सीमंधर स्वामी जी कि मुखाकृति दोनों मंदिरों  में एक सी है).

उनकी “मान्यता” है कि वर्तमान में “तीर्थंकरों” के मंदिर

मात्र महाविदेह क्षेत्र में विचरण करने वाले तीर्थंकरों के  ही है

बाकी मंदिर ” सिद्धों” के हैं क्योंकि वो मोक्ष जा चुके.

मूर्तिपूजक जैन सम्प्रदाय इसका समर्थन नहीं करते क्योंकि लाखों जैन मंदिर “२४ तीर्थंकरों” के नाम से ही है.

यदि ये सभी “सिद्ध” ही माने जाएँ तो फिर “वर्तमान चौबीसी” की बात करने का कोई मतलब ही नहीं रह जाता.

 

विशेष: अक्रम विज्ञान

मतलब ऐसा ज्ञान जिसका कोई क्रम ना हो और वर्तमान स्थिति में खोटा खरा जैसा भी है,
वहां से सीधे “जम्प” करके अपने को “शुद्ध” मान ले.

उदाहरण:

हर जैन सम्प्रदाय में ये कहा जाता है कि आत्मा अशुद्ध है : कर्म के कारण!
अक्रम विज्ञान ये कहता है कि मूल रूप से आत्मा शुद्ध है : और इसे अभी से ही शुद्ध मान लो.
अपने को “शुद्ध” अभी से मान लेना मतलब ये “मोक्ष” जाने की तैयारी!
इसलिए सामान्य लोग भी इसे जल्दी अपनाने को “सुविधाजनक” मानते हैं.
(जैनों के अन्य सम्प्रदाय इसे मान्य नहीं रखते).

 

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