धर्म की शरण

“दुखी” व्यक्ति “सुखी” को भी “दुःख” ही बांटता है 

परन्तु “सुखी” व्यक्ति “दुखी” को भी “सुख” ही बाटता है.

मनुष्य जन्म “सुख” प्राप्त करने के लिए है.

 

दु:खी होने के लिए नहीं.
दुःख मन का है,
मन को “सावधान” करने की जरूरत है
“सुख” पाने के लिए.
(कष्ट सहन करना और “दुःख” सहन करने में बहुत अंतर है).
कष्ट शारीरिक होता है और दुःख मानसिक !

 

“दु:खी” व्यक्ति का
कोई “धर्म” नहीं होता.

“धर्म” की “शरण” में जाते ही
सब “दुःख” दूर हो जाते हैं.
शर्त्त:-
दुःख का रोना
आज और अभी से
बंद कर देना होगा.

 

 

स्वयं से प्रश्न:
क्या मैंने “धर्म” की “शरण” ले ली है?
देखो :
यदि उत्तर तुरंत “हां” में आता है तो अवश्य ही सही है.
यदि उत्तर देने में सोचना पड़ रहा है :
तो अभी “शरण” पूरी तरह हुई नहीं है.
और यदि:
उत्तर ना का आता है
तो प्रश्न दोबारा पढ़ो.
तब तक पढ़ो जब तक
“मन” उसके लिए “हां”
ना कह दे.

More Stories
nageshwar-parshwanath
“परस्परोपग्रहोजीवानां”
error: Content is protected !!