जैन संघ पर उपसर्ग

भगवान महावीर स्वामी ने एक ही रात्रि में संगम देव द्वारा किये गए 20 उपसर्ग सहन किये और अपने नाम “महावीर” को “सार्थक” किया.

भूतकाल में भी जैन धर्म पर आक्रमण होते रहे हैं.

फिर भी जैनों  के लिए संतोष की बात ये है कि सर्वज्ञ भगवान ने कहा है कि उनका शासन  21000 वर्ष तक निर्विघ्न चलेगा और अनेक “आत्माएं” अपना “कल्याण” करेंगी. यदि 1978 के बाद से देखें तो अब तक जैन धर्म का खूब प्रसार हुआ है और जैन धर्म के मूल्यों की उपयोगिता सभी स्वीकारने लगे हैं.

 

“जैन संत” भगवान महावीर के शासन को पिछले 2500 वर्षों से भव्य-परंपरा से चला रहे हैं और भगवान महावीर  की हम “संतान” हैं. इस पंचम काल में भी साधू-साध्वी  पैदल विहार कर रहे हैं, श्रावक-श्राविकाएं छ: मासी तप, वर्षीतप और अन्य तप कर रहे हैं,  क्या ये “आश्चर्य” नहीं हैं.

राजस्थान हाई कोर्ट का फैसला कोई बहुत बड़ा मुद्दा नहीं है – जैन धर्म के लिए. इससे भी बड़े “झटके” जैन धर्म पर आये है जब मुग़ल-राज्य  के समय शत्रुंजय (पालिताना) में “भगवान ऋषभदेव” की प्रतिमा का सिर अलग कर दिया गया. फिर कर्माशाह के समय शत्रुंजय का सोलहवां उद्धार हुआ. प्रतिष्ठा के समय इसी प्रतिमाजी ने ७ श्वासोच्छ्वास ( live breathing – 7 times) लिए.

 

कहने का अर्थ ये है कि ये समय “धर्म” की “कसौटी” है. “यदा यदा हि धर्मस्य…” जब भी “धर्म” की हानि हुई है, “धर्म” वापस अपना नया अवतार लेता है, परन्तु उसका मूल स्वरुप “वही” रहता है. (यदि “मूल स्वरुप” बदल जाए, तो फिर वो “धर्म” नहीं रहता).

गोशालक  ने “तेजो लेश्या” भगवान महावीर से सीखी और उसका प्रयोग “भगवान महावीर” पर ही किया. आने वाला समय कैसा आने वाला हैं, इसका आभास तो यहीं से हो जाता है. इसलिए जैनों को हर संभव ये प्रयत्न करना चाहिए कि “विधि” चाहे अपने सम्प्रदाय में जो मान्य है, वो करें, पर “धर्म” के नाम पर एक हो जाए.

 

वर्तमान में “ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं अर्हं श्री धर्मचक्रिणे अर्हते नम:” का खूब जाप करना चाहिए.

इससे “धर्म” की “प्रभावना” होगी.

ये “अनुभव सिद्ध” मंत्र है, पर याद रहे इसको जपते समय “संपूर्ण श्रद्धा” “अरिहंत” पर रहे.

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