मूर्तिपूजा में “विश्वास” करें या “अविश्वास?” भाग – 2

हर व्यक्ति अपने स्वर्गीय माता पिता और पितर-कुल देवी देवता के फोटो पर “माला” चढ़ाता  है और उन्हें “तिलक” भी लगाता  है. “प्रसाद” भी “चढ़ाता” है ( प्रसाद “रखना” या हाथ से “उतारना” शब्द प्रयोग नहीं होता है). “चढ़ाना” शब्द इसलिए है कि उससे उनके प्रति “मन” में “भाव” “चढ़ते” हैं.

1. अपने जन्म के इन मूल संस्कारों को देख कर भी जो ये कहते हैं कि मेरा “मूर्तिपूजा” में “विश्वास” नहीं हैं क्या वो ये कह सकेंगे कि मेरा “मूर्तिपूजा” में “अविश्वास” है?

2. यदि हाँ, तो ये भी सीधे शब्दों में कहना पड़ेगा कि “मूर्तिपूजा” “गलत” है – तभी तो “विश्वास” नहीं है.

 

3. किसी का “विश्वास” खोना मतलब वो “विश्वसनीय” नहीं है (झूठा है) .

4. कुछ बातों को घुमा घुमा के कहने से कि मैं मूर्ति को मूर्ति “मानता” हूँ, परन्तु मूर्ति पूजा को नहीं मानता.
इसका मतलब क्या हुआ?

5. “मूर्ति” किसलिए होती है? मात्र देखने के लिए? यदि ये पुछा जाए कि ये मूर्ति “किसकी” हैं-तो जवाब क्या होगा?

“नाम” तो बताओगे ना! ये नाम कहाँ से आया? 

6. जो मूर्ति “श्री गणेश” की बनी होती है, उसे और कोई नाम दिया जा सकता है क्या?

7. “मूर्ति” भगवान की पहचान नहीं है क्या?

 

8. जो मूर्ति पूजा नहीं करते हैं, उनके भाव “मूर्ति” पूजने वालों से ऊँचे ही होते है – इसे किस “विश्वास” से कहा जा सकता है? जबकि “मूर्तिपूजा” करने वाले का “व्यवहार” ही बता देता है कि वो मूर्ति में “भगवान” होने का “भाव” रखता है.

एक और बात, क्या एक ही सम्प्रदाय के सारे गुरुओं के प्रति आपका “एक सा” “भाव है” क्या?
आपके स्वयं का “एक ही व्यक्ति” के प्रति हर समय ‘एक सा भाव’ रहता है क्या?
उत्तर है नहीं.
परन्तु रोज भगवान की मूर्ति को देखने से उनके प्रति “एक सा भाव” रहता है क्या?
उत्तर है नहीं.
“भाव” उत्तरोत्तर “बढ़ता” जाता है.
इसलिए मूर्ति पूजा मन के “भावों” को बढ़ने में सहायक है.

10. जो ये कहता है कि मैं “ऐसी व्यवस्था” को नहीं “मानता,” मतलब उसका उस दृष्टिकोण से “विरोध” है!

कई बातों को  “नहीं मानने” का कारण है – उसकी अपनी “समझ” से “बाहर” होना !

 

या “परंपरा” से “हठ” को पकड़े रहना. “परंपरा” की “शुरुआत” कहाँ से हुई, इस “गहराई” में नहीं जाना.

जैसे किसी को अपने ही “धंधे” से “विश्वास” इसलिए उठ जाता है क्योंकि वो पैसा खूब “डूबा” चुका होता है जबकि उसी “धंधे” में कुछ “लाखों” कमा रहे होते हैं. अब निर्णय करें कि “व्यक्ति” की “सोच” गलत है या “धंधा?”

यदि उसके ही “अनुभव” को “सच्चा” माने (क्योंकि वो तो पैसा डूबा चुका, इसलिए “अनुभवी” तो है ही 🙂 ,तो फिर किसी को भी “धंधा” करना ही नहीं चाहिए.

निष्कर्ष:

“मूर्तिपूजा” जैनों का “धार्मिक संस्कार” है.

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पार्श्वनाथ स्वामी
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