“सुख” चाहते हो – तो “स्वार्थी” बनो! भाग-2

“व्याख्यान में “परम सुख” प्राप्त करने के रास्ते बताये जाते हैं.
हर बार व्याख्यान में “अपनी आत्मा” का “उद्धार” करने की बात कही जाती है.
“दूसरे” की “आत्मा” की नहीं.

इसलिए हमें “दूसरों” की चिंता छोड़ कर “खुद” की चिंता ही करनी चाहिए.

“दूसरे” कौन हैं?
ये “खुद” से पूछो!

मतलब?

“तुम्हारे” अलावा जितने भी हैं,
वो सब दूसरे हैं!

तुम जब “हॉस्पिटल” में भर्ती होते हो
तो दूसरे तुम्हारे साथ में “भर्ती” होते हैं क्या?

 

“खुद” क्या हो?

“एक अविनाशी आत्मा!”
“एक परम शक्तिशाली तत्त्व”
“पूरे ब्रह्माण्ड” के बारे में जानने वाला “ज्ञानी”
और वो भी बिना “शरीर” के!
“पूरे विश्व में एक भी स्थान ऐसा नहीं है जहाँ ये
“ट्रैवलिंग” कर के नहीं आया हो,
(याद नहीं है, वो बात अलग है, क्योंकि अभी तंद्रावस्था है)
“travelling” कभी सुखद होती है और कभी दुखद.

हर व्यक्ति की इच्छा ऊँचे से ऊँचे पहाड़ पर चढ़ने की होती है.
“गहरी खाई” में “उतरने” की “इच्छा” कभी नहीं होती.
क्योंकि “आत्मा” का “मूल स्वभाव” ही “ऊपर” उठना है.

 

प्रश्न:
तो फिर हमारी “आत्मा” इतनी गिरी हुई है ऐसा क्यों कहा जाता है?

उत्तर:
हम “बार बार” ऊपर चढ़े हैं
पर “ध्यान” ना देने के कारण बार बार खाई में “गिरे” हैं
इसलिए!

फोटो:
हिंगोली (महाराष्ट्र) जैन तीर्थ
मानो सन्देश दे रहा हो कि आत्मा को इतना ऊपर उठ कर
“स्थिर” होना है.

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