माँ सरस्वती-1

जैन धर्म में “सूरिमंत्र” की प्रथम पीठ “भगवती सरस्वती” है.
(भगवती शब्द स्त्रीलिंग है और भगवान शब्द पुरुष लिंग).

प्रश्न:

“सूरिमंत्र” में “सरस्वती” का प्रथम स्थान क्यों है?

उत्तर:

“ज्ञान प्राप्ति” ही जैन धर्म का मुक्य उद्देश्य है.
“जीव” मोक्ष तभी जाता है, जब उसे “केवल ज्ञान” हो गया हो.
“जीव” को अपनी “आत्मा” का जब तक ज्ञान ना हो तब तक वो सम्यक्तत्व प्राप्त नहीं करता.

 

ज्ञान” के बिना सब व्यर्थ है.
(एक “पागल” के पास धन हो तो उसे क्या पता कि “धन” का क्या  “उपयोग” होता है.
इसीलिए व्यवहार में एक पैसे वाला आदमी; जो जीवन में मात्र पैसा कमाता है और पैसे का कुछ भी सदुपयोग नहीं करता उसे “धन” के “पीछे” (आगे नहीं) पा-ग-ल कहा जाता है.

“सरस्वती” एक मात्र ऐसी “शक्ति” है जिसके दो वाहन हैं :
१ मोर
२. हंस

जिन्हें “कला” के क्षेत्र में ज्ञान प्राप्त करना है, वो “मयूरवाहिनी” सरस्वती की साधना करते हैं.
( पक्षिओं में मात्र मोर ही नाचता है – हालाँकि मोर भी “ज्ञान” का प्रतीक है, श्रीकृष्ण ने मयूर पंख अपने सर पर धारण की और “गीता” का उपदेश दिया).

 

जिन्हें सम्यक ज्ञान प्राप्त करना है, वो “हंसवाहिनी” सरस्वती की साधना करते हैं. (हालांकि “हंसवाहिनी” के हाथ में भी “वीणा” होती है जो “संगीत” का ज्ञान देती है. ये  उन्हें “भावपूर्वक भजन” गाने में सहायक बनाती है).

ये ज्यादातर लोगों ने भ्रम फैलाया कि “सरस्वती” और “लक्ष्मी” का आपस में बैर है.
वास्तविकता ये है कि “सूरिमंत्र” की तीसरी पीठ “महालक्ष्मी” है.

“सरस्वती” की प्रतिमा” गौर से देखेंगे तो पता पड़ेगा उनका मुकुट भी “स्वर्ण” का है, कोई लोहे का नहीं.
“जो भक्तों को वरदान दे सकती है, क्या वो “पुण्यशाली” नहीं होगी – और वो भी जब स्वयं देवी हो?

आज हम देख रहे हैं कि पढ़े-लिखे लोग आराम से पैसा कमा रहे हैं, हां ये बात अलग है कि ऊँची शिक्षा लेने कि लिए खूब पैसे की जरूरत होती है. इसलिए बात दोनों के “समन्वय” (को-ऑर्डिनेशन) की है.

 

१. सरस्वती के चार हाथ होते हैं. हर देव-देवी के कम से कम चार हाथ होते हैं – जो उनकी ऊँची गति के साथ ये भी सूचित करते हैं कि उन्हें काम ज्यादा करना है. मनुष्यों के दो हाथ होते हैं और काम करने वाले मनुष्य भी देवों की अपेक्षा अपनी बहुत कम उम्र के बावजूद जीवन में बहुत काम कर लेते हैं. जो जानवर होते हैं, उनके हाथ पाँव में बदल जाते हैं इसलिए वो चार पाँव वाले हो जाते हैं.

तो फिर ये प्रूव हुआ कि देव ज्यादा काम कर सकते हैं जो हमें हमारी इन आँखें से नहीं दिख पाता. और जब उनका काम दिखता है तो हम उसे चमत्कार कहते हैं.

आगे पढ़ें :माँ  सरस्वती-२

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