प्रेरणामय जीवन जैन श्रावकों का!

सेठ “मलूकचंद”

मांडल के सेठ “मलूकचंद” घोड़ी पर बैठकर “शंखेश्वर पार्श्वानाथ” के दर्शन करने जा रहे थे. रास्ते में चार डाकुओं ने रोका और सारा धन देने के लिए धमकाया.

करुणामयी सेठ ने पूछा: भाई,…..ये लूंट का “धंधा” किसलिए करते हो?

डाकुओं ने कहा : घर में खाने के लिए “धान” नहीं है, छोकरे भूखे मरते हैं, इसलिए.
सेठ : मैं तुम्हारे लिए “रकम” मंगा  देता हूँ.  खेती करो तो “धान” भी मिलेगा और नफा भी….और ये पापी धंधा…
डाकू : यदि “रकम” अभी ही मंगादो, तो हम “आजीवन” लूंट नहीं करेंगे.
सेठ ने आदमी भेजे और “कॅश” मंगवाया.

 

“डबल पुण्य” से कमाई “रकम” से लूंटने वालों को “काफी नफा” हुआ.
“भावना” तो पहले ही बदल गयी थी, अब उनके “भाव” बढे.
“पैसा” वापस लौटाने आये, सेठ को.
“सेठ” ने कहा…..ये पैसा जो लूंट का धंधा करते हैं, उन्हें देकर “पापमुक्त” जीवन का प्रचार करो.

जैनों की दूरदर्शिता अब कहाँ है?
हर” शहर में एक जैन स्कूल तक खोलने का ठिकाना नहीं है, उच्च-संस्कार  कहाँ से मिलेंगे?

 

जबकि “अल्पसंख्यक” (minority) अपने धर्म की स्कूल खोल सकते हैं. इसके लिए कम से कम शुरुआत में जैनों को कुछ भी नया “कंस्ट्रक्शन” करने की जरूरत नहीं है. हर गाम और शहर में जैन मंदिर और उपाश्रय जिनके पास विशाल जमीन और धर्मशाला भी है.

जिनमें से ज्यादातर पूरे साल भर उपयोग में नहीं आते. उन्हें स्कूल और कॉलेज में Convert किया जा सकता है.  इसमें भी अत्याधुनिक सुविधाएं देकर समाज को मात्र 10 वर्ष में ऊंचाई पर लाया जा सकता है.

परन्तु देखा ये गया है कि समाज में जैसे ही “थोड़ा” काम होने लगता हैं, “थोड़ी” बुद्धि वाले “बड़ी बड़ी” बातें करने लगते हैं और ऐसे लोगों को “व्यवस्था” में “शामिल” किया जाता है जिन्हें ना तो समय होता है और ना ही “व्यवस्था” चलाने का “ज्ञान.”

 

यही कारण है कि एक जैन यूनिवर्सिटी बनाने के निर्णय लेने में हमें 10 साल लग जाते हैं और बनाने में दूसरे 10 साल. तब तक हज़ारों जैन नवयुवक (New Generation) “विदेश” जा चुके होते हैं, अच्छे “करियर” की खोज में!

More Stories
भक्तामर और उवसग्गहरं स्तोत्र में “मातृका” प्रयोग-3
error: Content is protected !!