jainism pillars

“जैन-धर्म” के कुछ “अति गम्भीर विचारणीय पहलू”

 

क्या कहीं किसी शास्त्र (literature) में लिखा है कि “दिगंबर” होने से ही उत्कृष्ट साधना होती है?
क्या कहीं किसी शास्त्र में लिखा है कि  सफ़ेद या पीली चादर पहनकर “धर्म” में अपनी अलग पहचान बनानी चाहिए?
क्या कहीं किसी शास्त्र में लिखा है कि “मुहपत्ति” को मुख पर हरदम बाँधने से ही “उत्कृष्ट” अहिंसा का पालन होता है?
क्या कहीं किसी शास्त्र में लिखा है कि श्वेताम्बर पंथ में “मंदिरमार्गी” और “साधुमार्गी” दो अलग अलग “सम्प्रदायों” की “धर्म” में अति आवश्यकता है?
क्या कहीं किसी शास्त्र में लिखा है कि “साधुमार्गी” ही “सच्चा” जैन धर्म है?
क्या कहीं किसी शास्त्र में लिखा है कि “मंदिर” में जिन-पूजा ही “मोक्ष” की गारंटी है?
क्या कहीं किसी शास्त्र में लिखा है कि मोक्ष पाने के लिए “शारीरिक घोर तपस्या” करना अति आवश्यक है?

 

“जैन धर्म” में विभिन्न सम्प्रदाय हों, ये स्वीकारा जा सकता है,
पर “मेरा ही मार्ग सही है,” यही बात जैन धर्म के मूल सिध्दांत “अनेकांत” के “विरुद्ध” है.

तीर्थ भूमि के झगडे,
(श्वेताम्बर और दिगम्बरों के बीच)
संवत्सरी के झगडे,
(चौथ और पाँचम का झगड़ा -कैसी क्षमापना)?
मंदिरों में ट्रस्टियों के आपस में झगडे,
(ट्रस्टी का अर्थ होता है वो व्यक्ति जो “विश्वसनीय हो)!
फण्ड का वर्षों तक बिना उपयोग लिए मात्र फिक्स्ड डिपाजिट में पड़े रहना,
(ये है “पेढ़ी ” चलाने वालों की हकीकत).
“घी” की बोली से शुरू हुई आज “धर्म” के नाम पर खुली नीलामी
(जहाँ भीड़ इकट्ठी हुई नहीं कि नीलामी शुरू)
करोड़ों रूपये खर्च करना “धर्म” के नाम पर,
परन्तु साधर्मिक की कोई देखभाल ना करना,
साधू-साध्वियों का सूर्योदय से (रात्रि को) पहले विहार करना
जमीकंद, रात्रि भोजन और होटल्स में “जैनियों” का खुलेआम जाना,

भोजनशाला में “मृत-व्यक्तियों” के फोटो लगाना,
“लाभ” के नाम पर श्रावकों से “कुछ” भी “बटोरना”
(नाम की पट्टी लगाना )
अप्रत्यक्ष रूप से आचार्यों का “साधना- धाम” पर “कब्ज़ा” होना
(पहचान के लिए अपने गुरु का नाम सबसे पहले रखना
-महावीर के नाम को “जान-बूझकर” भूल जाना),

ये सब आज के “जैन-धर्म” का वास्तविक स्वरुप है.
जिनका “आत्मा” से कोई सम्बन्ध नहीं है.

“शरीर” कुछ पहने या ना पहने,
पर “ध्यान” हो आनंदघन जी की तरह “आत्मा” का
“मुख बंधा हो या खुला,
पर “वाणी” हो मात्र “अरिहंत” की

सभी को सच्चे निर्ग्रन्थों की आवश्यकता है
सभी के “कल्याण” के लिए.

जैन धर्म में ऐसे “क्रियोद्धार” की जरूरत है
जहाँ “सभी” एक दूसरे से “सच्चा” सम्बन्ध बना सकें:

परस्परोपग्रहो जीवानां

 

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