जय वीयराय !

इस सूत्र का नाम “प्रार्थना सूत्र” है.

यद्यपि तीर्थंकरों से कुछ भी माँगा नहीं जाता (मांगने की बात जैन धर्म में कहीं पर भी नहीं होती, तीर्थंकरों की भक्ति के कारण पुण्य स्वयं प्रकट होता है और सभी चीजे स्वत: ही प्राप्त होती है) फिर भी ये  सूत्र  इसका अपवाद (Exception) है.

इस सूत्र में मन की एकाग्रता और दृढ़ निश्चय के साथ प्रार्थना की जाती है इसलिए इस सूत्र को “प्रणिधान सूत्र” भी कहा जाता है.

(जैसा कि अष्टांग योग के पांचवे अंग “ईश्वर प्रणिधान” में बताया गया है. अष्टांग योग के बारे में jainmantras.com में पहले ही लिखा जा चूका है).

 

 

इस सूत्र से भगवान से 8 बातों की प्रार्थना की गयी है:

१. भव निर्वेद (संसार से राग ही ना हटे बल्कि उससे कंटाळा आये)
२. मोक्षमार्ग का अनुसरण

३. इष्टफल की सिद्धि

विशेष:
सिद्धि मंत्र-विज्ञान का नतीजा है-इस सूत्र में इसे गुप्त रूप से शामिल कर दिया गया है – भगवान की भक्ति से सम्यक्त्तव प्राप्त होता है और जो समकितधारी होते हैं, उनके “कर्म” बहुत हलके हो जाते हैं इसलिए उन्हें “इच्छित वस्तु” प्राप्त हो ही जाती है.

 

४. लोक विरुद्ध का त्याग
वर्तमान में यदि लोक विरुद्ध कार्य करना भी पड़ रहा हो, तो भी इस सूत्र के प्रभाव के कारण ऐसी व्यवस्थाएं स्वत: ही हो जाती है की ऐसे कार्य से “छुटकारा” मिल जाता है.
५. गुरुजन की पूजा
हमारे पास समय होगा, तभी तो हम गुरु की पूजा कर सकेंगे – इस सूत्र का गर्भित प्रभाव ये है कि हमें दैनिक जीवन में आने वाली समस्याएँ स्वत: ही समाप्त हो जाएँगी.
६. परोपकार
परोपकारी वो ही होता है, जो समर्थ होता है. उदाहरण के तौर पर रोगियों की सेवा वो ही कर सकता है जो स्वयं निरोगी हो, ज्ञान वही दे सकता है जो स्वयं ग्यानी हो, पैसे से जरूरतमंद लोगों की सहायता वो ही कर सकता है जो स्वयं पैसे से संपन्न हो, इत्यादि.

 

७. सुगुरु का योग
ये “नित्य” (daily) पुण्य प्रकट करने का सबसे महत्त्वपूर्ण कारण है.
८. सुगुरु के वचन का हमेशा पालन
ये भी वही कर सकता है जिसे पॉइंट नंबर ७ का योग प्राप्त हो.

कुल मिलाकर यदि एकाग्र मन और दृढ़ निश्चय से “जय वीयराय सूत्र” से वीतराग परमात्मा से प्रार्थना की जाए, तो ये सूत्र सभी कुछ देने में समर्थ है जो एक जैनी को मिलना चाहिए.

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