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केवल-ज्ञान और आत्म-ज्ञान

केवल-ज्ञान और आत्म-ज्ञान

“आत्मा” के बारे में “कुछ” जानने के बाद
ज्यादातर लोग ये “भ्रम” पाल बैठते हैं
कि अब “आत्मा” के अलावा जो भी बात की जाए,
वो सब निरर्थक (फालतू) है.

मानो खुद “संसार” में रह कर
“आत्मा” के अलावा कुछ बात ही नहीं करते हों.

“केवल-ज्ञान” और “आत्म-ज्ञान” दोनों एक नहीं हैं.
“केवल-ज्ञान” तो “आत्म-ज्ञान” से बहुत ऊँचा है.

व्यावहारिक दृष्टिकोण से तीर्थंकरों का केवलज्ञान तो
सबसे ऊँचा है.
क्योंकि “अन्य केवली” के पास “सम्पूर्ण ज्ञान” तो प्रकट होता है,
परन्तु वो “भाषा” प्रकट नहीं होती,
“वाणी” का वो “ओज” प्रकट नहीं होता,
जो तीर्थंकरों के पास होता है.

खुद के पास “ज्ञान” हो
और दूसरों को समझा ना सके,
तो वो ज्ञान “लोक-कल्याणकारी” नहीं हो पाता.

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