keval gyan, jainmantras, jains, jainism

“केवल ज्ञान” एक “घटना” है.

जो “सुख” से “निर्लिप्त” है

अरे !
जिसे “मोक्ष” (moksh) की भी “इच्छा” नहीं है,
वो तो इसी जन्म में “मुक्त” जैसा ही है.
(मोक्ष की भी “इच्छा” करने से “मोक्ष” नहीं मिलेगा,
ये बात मैंने श्री उदय नागौरी को
आज से लगभग बीस वर्ष पहले कही थी).

भगवान् महावीर (lord mahavira) को भी
एक क्षण पहले “केवल ज्ञान” (keval gyaan) नहीं था,
और दूसरे क्षण “केवल ज्ञान” “प्रकट” हुआ.

ये “प्रकट” होना किस बात का “सूचक” है? हम ये नहीं कह सकते कि उन्होंने “केवल ज्ञान” “ले लिया.” वो तो “प्रकट” हुआ, मोक्ष के प्रति “पुरुषार्थ” के कारण !”केवल ज्ञान” महज एक “घटना” है. “मुक्त” जीवों के लिए.

प्रश्न:
क्या “केवल ज्ञान” प्राप्त होने से पहले
भगवान् महावीर ने किसी भी वस्तु पर आसक्ति रखी थी?

उत्तर है नहीं.

बस, इसीलिए एक स्टेज पार करने के बाद
केवल ज्ञान प्रकट होना ही था.

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पच्चक्खाण “ध्यान” की पहली सीढ़ी है.
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