कभी “इच्छा” करो कि जैन संतों के पास महीने में मात्र एक घंटे बैठें. भले ही वो “चमत्कारी” ना समझे जाते हों.

आपको “चमत्कार” तो इस बात का लगना ही चाहिए कि हम भरी गर्मी में तो ए.सी. के बिना बैठ नहीं सकते और ये गर्मी में पंखा तक नहीं चलाते. पसीने से उनका “शरीर” स्वत: ही “नहाता ” रहता है क्योंकि वे खुद तो दीक्षा लेने के बाद पूरे जीवन भर नहाते नहीं है.

 

इतना होने के बावजूद कभी किसी ने नहीं कहा कि ये कैसी “व्यवस्था” है साधुओं के लिए! क्या ये चमत्कार नहीं है!

वास्तविकता ये है:

वो “नहाते” हैं “आत्मज्ञान” से क्यूंकि उसी का “अस्तित्त्व” है और आत्मा “सूक्ष्म” भी है और “विराट” भी.

एक “साधू” का क्या “आचार” होना चाहिए, वो सब जैन ग्रंथों  में लिखा है. ये गुरु परंपरा के कारण  आज भी हमारे पास है. एक “श्रावक” का क्या आचार होना चाहिए, ये भी जैन ग्रंथों में लिखा है, यदि इसे पढ़ लें या जान लें तो पता पड़ेगा कि “सरकार” ने भले ही हमें “माइनॉरिटी” का दर्ज दिया हो, पर “हकीकत” में तो पूरे भारत में उतने श्रावक नहीं हैं, जितने अपने नाम के आगे जैन लिखने का “हक़” बताते हैं.

 

समय आने पर जैन श्रावकों ने “पद-भ्रष्ट” साधुओं को भी “प्रतिबोध” दिया है. ये खुद भगवान महावीर ने “उत्तराध्ययन सूत्र” में कहा है.

है कोई धर्म में ऐसा ऐलान जहाँ भरी सभा में जगत गुरु ये कहता हो कि मेरे “फॉलोवर्स” अपने गुरुओं को भी प्रतिबोध कर सकते हैं फिर भी वो “पूजनीय” नहीं हो सकते क्योंकि पूजनीय तो “साधू” ही जाता है.

कारण?

उत्तर इसी पोस्ट में लिखा है. जरा पोस्ट को दोबारा पढ़ लें.
अपने “मतिज्ञान” (mind) का उपयोग करें. कुछ विश्लेषण (analysis) करें.
जैन धर्म की बातें “दिमाग” में “घुसनी ” ही तब शुरू होगी जब “सम्यक्त्त्व” का कुछ अंश “आत्मा” में प्रकट हुआ हो.

 

जब धर्म सम्बन्धी बातें अच्छी लगने लगें, तो समझना कि “कल्याण” निश्चित हो गया है और “परम-सुख” की “डिग्री” जरूर मिलने वाली है. एक बार “पोस्ट ग्रेजुएशन” की डिग्री मिल जाए, तो किसी की ताकत  नहीं है कि कोई आपसे वापस  छीन ले. ये कोई “पुरस्कार” नहीं है जो आप वापस “लौटा” सको. ये तो “प्राप्ति” है “खुद” की “खुद” में. यानि “आत्मा” “खेलती ” है अपनी “आत्मा” में.

विशेष: ऊपर की पोस्ट की कुछ बातें समझ में ना भी आये तो  भी आपको “आनंद” लेने से कोई रोक नहीं सकता.  क्या मूवी में जो दिखाया जाता है, वो सारा “गले” उतरता है? नहीं ना!
फिर ये तो “परम-सुख” की बात है और  तीर्थंकर स्वयं कहते हैं कि वो “आत्मसुख” का “मुख” से “विवरण” करने में अपने को समर्थ नहीं पाते.