मंत्र- योग से सिद्धि

१. “मन” को यदि १० सेकण्ड्स के लिए भी “एक स्थान” पर स्थिर कर सको,
तो आप एक गृहस्थ होते हुए भी एक “योगी” बनने की पूरी योग्य रखते हो.

१० सेकण्ड्स के लिए भी “एक स्थान” पर
“मन” को स्थिर करना
कोई “मजाक” नहीं है.

एक सेकंड का भी जीवन में “बहुत बड़ा” मूल्य है.
भगवान महावीर को
“जिस समय” (सेकंड) केवल ज्ञान हुआ,
उसके जस्ट एक सेकंड पहले
वो ज्ञान उनको नहीं था.

 

२. हर व्यक्ति कुछ ना कुछ जीवन में “प्राप्त” करना चाहता है.
बस समस्या ये है कि वो “लक्ष्य” निर्धारित नहीं कर पाता.

३. “मंत्र-विज्ञान” ऐसे “योग” बना देता है, जिससे वो लक्ष्य बन जाता है
जो साधक के लिए सबसे अच्छा हो.

४. इसका मतलब है,
“साधक” सिर्फ ये निर्णय करे कि
“जो मेरे लिए अच्छा है,
वो हो”
ना कि “यदि मेरी “नौकरी” वहां लग जाए तो अच्छा!

 

“वहीँ” पर “नौकरी” लग जाने के बाद “बॉस” से ना बनी तो?
“अब कुछ” दूसरी इच्छा करनी पड़ेगी.
“फिर वो भी आपके लिए “अच्छी” नहीं हुई तो?

इसका मतलब “मंत्र-विज्ञान” वो रहस्य है
कि अपना “केस” “मंत्र” को ही पूरी तरह सौंप दिया जाए.
इससे “मंत्र” के लिए “मैदान” खुला हो जाता है.

आपके लिए सबसे बेस्ट जो है, वही हो जाता है.

 

मानो कि आप नीचे लिखा मंत्र जप रहे हो :

ॐ  ह्रीं श्रीं कीर्ति कौमुदी वागीश्वरी प्रसन्न वरदे कीर्ति मुख मन्दिरे स्वाहा ||

ये मंत्र दिखने में ऐसा लग रहा है मानो प्रसिद्धि प्राप्त करने के लिए मंत्र-जप किया जा रहा हो.
परन्तु वास्तविकता बहुत अलग है.

प्रसिद्धि कब प्राप्त होगी?
जब कार्य सिद्ध होगा तब!

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