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नमस्कार और आशीर्वाद – 2

हम नमस्कार किस लिए करते हैं?
बचपन से संस्कार मिले हैं, इसलिए?
आशीर्वाद मिलेगा, इसलिए?
विनयी माने जाएंगे, इसलिए?
नमस्कार ना करें, तो लोग क्या कहेंगे, इसलिए?

क्या सभी गुरुओं पर श्रद्धा एक सी आती है?
क्या सभी बड़ों पर श्रद्धा एक सी होती है?

 

मतलब हर “क्रिया” करते समय जाग्रति रहनी  चाहिए.
हर समय “जाग्रत” रहने का अर्थ है,
जो घटनाएं घटित  हो रही हैं,
उनमें  “भेड़-चाल ” की तरह ना जुड़ कर,
उसके “प्रभाव” को “देखना.”
उस पर “चिंतन” करना,
उस पर “मनन” करना.

आप ये पोस्ट भी क्यों पढ़ रहे हैं, इस पर भी चिंतन करना.
कहने वाला अपनी “थोप” रहा है या कहीं से पढ़ा हुआ “कॉपी-पेस्ट” कर रहा है या
मात्र “साइट” भरने के लिए कुछ लिख रहा है, इस बात का भी विचार करना.

 

जो भी हम “जान” पा रहे हैं, हमारे जीवन में उपयोगी है या नहीं, इस बात का भी विचार करना.
लोग साइट पर खूब सर्च करते हैं और कर्सर ऐसे घुमाते हैं मानो रेस में लगे हुवे हों!
इससे “प्राप्त” कुछ भी नहीं होता.
क्योंकि ये जान लेने पर कि किसी वस्तु के खूब फायदे हैं
तो भी मात्र जान लेने से कोई फायदा नहीं होने वाला.
उसे अपनाने पर ही फायदा होने वाला है.

बात चल रही है : नमस्कार करने की.
बहुत सामान्य सी बात लगती है
परन्तु सामान्य है नहीं.

 

लोग “तिरुपति मंदिर”
नमस्कार” करने के लिए जाते हैं
या
कुछ “प्राप्त” करने के लिए?

क्या मात्र 10-15 सेकण्ड्स के दर्शन से खूब लाभ मिल जाता है?
सभी कहेंगे: हां, देखो तो भीड़ क्या यूँ ही लगती है?

jainmantras.com का ये कहना है की जिस “नमस्कार” को करने के लिए आप बारह घंटे भी लाइन में लगने के लिए तैयार हो,  तो इसका मतलब ये है कि आपमें “नमस्कार” करने की “योग्यता” आ गयी है. भले ही कुछ “प्राप्त” करने की “आशा” में ही वो लाइन क्यों ना लगाईं हो.

 

जब दर्शन दुर्लभ किये जाते हैं, तो व्यक्ति ये “मानता” है कि यहाँ “कुछ” बात है.
जहाँ दर्शन सुलभ हों, बड़े आराम से हो सकते हों, जितनी देर चाहें, उतनी देर कर सकते हों,
वहां उन्हें ये लगता है कि यहां वो बात नहीं है.

मतलब “भीड़” को हम “प्रभावक” मानते हैं.
संख्या को हम बड़ा मानते हैं.
संख्या के आधार पर तो मुस्लिम और ईसाई बहुत ज्यादा हैं विश्व में,
तो क्या जैनी होकर उन धर्मों को “ऊँचा” मानने के लिए तैयार हो?

 

किसी भी जैन मंदिर में प्रतिमाजी के दर्शन करने से पहले वहाँ जो “खम्भे” लगे हुवे हों,
उनको गौर से देखना.
विचार करना कि पूरा मंदिर तो छोडो, क्या “एक खम्भा “बनाने की भी मेरी हैसियत है?
अरे! हैसियत भी छोडो, कभी “बनाने” का “विचार” भी आया है?
कभी ऐसी “भावना” भी आई है?

 

फिर देखो, वो मंदिर कैसा चमत्कारी लगेगा
और “भगवान” को एक बार तो क्या हज़ार बार भी नमस्कार करोगे
तो भी तृप्ति नहीं आएगी.

विशेष: जब “नमस्कार” करते रहने से ही तृप्ति  नहीं आती हो, तो आशीर्वाद की बात बाद में करेंगे.

पहले “भगवान” को नमस्कार करके तृप्त हो गए, ऐसा महसूस करो. 

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