नमस्कार और आशीर्वाद- 5

हम रोज मुंह को झुका कर ही कई क्रियाऐं करते हैं.

सवेरे सवेरे
आँखों को धोते समय,
टूथब्रश करते समय,
नाश्ता करते समय,
फिर
नहाते समय,
पढ़ते समय,
लिखते समय,

(अभी तो यंग जनरेशन की हरदम आँखें नीचे रहती हैं मोबाइल पर -आँखें नीचे तभी रहती है जब सर झुका हुआ हो) 🙂

 

और तो और जूते “पहनते” समय,
इत्यादि.

चलते समय भी नीचे देखने का विधान है जैन शास्त्रों में.
मतलब  ज्यादातर क्रियाएँ हम झुककर ही करते हैं.

जब सामान्य क्रियाओं में “झुकना” अनिवार्य है
तो क्या भगवान के सामने उसी सामान्य तरीके से नमस्कार करेंगे?
नहीं ना!
उनके प्रति तो हमारा कितना अहोभाव है.
अरिहंतों के सामने “प्रत्यक्ष झुकने” का “चांस” ही हमें मिला है
जैन मंदिरों की उपस्थिति के कारण!

 

और आज!
हम में से ज्यादातर जैनी रोज मंदिर ही नहीं जाते.
कई तो “उठावने” में मंदिर तक जाकर भी मंदिर में प्रवेश नहीं करते.
मानो सारा “पाप” मंदिर में प्रवेश करने से ही होता हो!
कैसी भ्रामक मान्यता है – जैनी होकर भी!

मतलब “खुद” ही जिम्मेवार है, “पुण्य” को प्रकट करने से खुद ही वंचित हो रहे हैं
सारी व्यवस्था होने के बावजूद भी.

 

अब एक अति विशेष बात:
भगवान की प्रतिमा के “दर्शन” करते समय कई जन “आँखें” बंद कर लेते हैं.
अरे! दर्शन करने आये हो या काउसग्ग करने?
भगवान सामने है और
आप आँखें बंद कर रहे हो!

कोई आपसे मिलने आया हो और आपको “घर” पर देखकर अपनी “आँखें” बंद कर ले तो आपको कैसा लगेगा?

 

“आखें” बंद करने से “भगवान” नज़र आते हों तो बहुत अच्छी बात है
फिर मंदिर आने की क्या आवश्यकता है?

कहने का अर्थ ये है कि अभी तो हमें मंदिर  में “दर्शन” करने का तरीका भी सीखना पड़ेगा.
“नमस्कार” करना तो बहुत दूर की बात है.  

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