नमस्कार और आशीर्वाद – 7

प्रभु के दर्शन कैसे करें?

पूर्व भूमिका से आगे :
१. किसी से “रिश्ता” जोड़ते समय बहुत सावधानी और चतुराई बरती जाती है…..
२. “धर्म” की एग्जाम  में बैठने की “पात्रता” तो ले चुकें हैं
परन्तु “फ़ैल” होने के लिए!
क्योंकि “प्राप्त” कुछ किया ही नहीं.

 

अब आगे:
जैन शास्त्रों में जिन-मंदिर के “दर्शन” करने की भी एक विधि है.
सभी एक ही तरीके से “दर्शन” और “नमस्कार” करें,
इसके लिए विधि बनाई गयी है
जैन शास्त्र बिना “विधि” (method) के  कोई बात नहीं करते.
और वो विधि सबको बताई गयी है. कुछ भी छुपाया नहीं गया है…
यानि ऐसा नहीं है कि पैसे वाले को उत्कृष्ट विधि बतायी
और अन्यों को कुछ और!

 

मंदिर जाने के लिए भी तैयारी करनी होती है “मन” से.
हालांकि बिना “मन” के  यदि कोई मंदिर के “दर्शन” करते हैं तो वो हैं बच्चे;
जिन्हें माता-पिता संस्कार  देने के लिए मंदिर भेजते हैं.
(बड़ी उम्र के लोग जो आदतन जिन मंदिर के दर्शन करते हैं
वो भी बच्चे ही हैं – शास्त्र उन्हें “बाल-जीव” कहते हैं).

मंदिर जाने की पूर्व तैयारी:
पहले चावल, बादाम, मिश्री,  नैवेद्य, धन, इत्यादि मंदिर में चढाने के लिए तैयार रखें.
शुद्ध वस्त्र वैसे पहनें जैसी हमारी “हैसियत” (capacity) है.
(अपनी हैसियत से “कमजोर” कपडे पहन कर मंदिर में जाने की इज़ाज़त नहीं है
– और…. जिस व्यक्ति पर “कर्ज़ा” (loan) हो,
उसे  मंदिर में कुछ भी “चढाने” का “अधिकार” नहीं है…..).
श्रावक लोग “चेतें.” जो लोन लेकर धंधा करते हैं, वो खासकर के.

 

यहाँ कइयों को आपत्ति हो सकती है कि फिर तो कोई भी जैन मंदिर के दर्शन करने के लिए ही  नहीं जा सकता
क्योंकि आज लगभग सभी धंधे के लिए लोन तो लेते ही हैं. जो धंधा नहीं करते वो भी फ्लैट और कार इत्यादि के लिए तो लोन लेते ही हैं.
( jainmantras.com की पोस्ट पढ़ें : ऋणमुक्ति और अशुभ कर्म झटके से तोड़ना).

शंकानिवारण :
१. जिसके सर पर कर्ज़ा हो, वो देव को क्या  चढ़ाएगा?”
२. जिनके सर पर कर्ज़ा हो, क्या वो “मंदिर” का “निर्माण” करने की सोच भी सकता है?
३. जो लोग जोश में ऊँची बोलियाँ बोलते हैं वो सालों  तक पढ़ी में रुपये क्यों नहीं भरते?

 

जिनेश्वर देव को वही “चढ़ा” सकता है जो खुद की हैसियत रखता हो.
यदि लोन उतना ही है धंधे में, जितना वो जरूरत होने पर चुका सकता हो, तब कोई बात नहीं है.
“जिनेश्वर” देव खुद तो कुछ भी ग्रहण नहीं करते, फिर भी हमें तो उत्कृष्ट भाव चाहिए ना.
जो लोन में डूबा हो, वो भक्ति करते समय “उत्कृष्ट” भाव कहाँ से लाएगा?

मंदिर के दर्शन के लिए जाने का मतलब : मन में अति उत्साह!
हम पार्टी में जाते हैं तो नए वस्त्र पहनते हैं ताकि मन में उत्साह रहे.
जैन मंदिर में दर्शन करने वाले “अति समृद्धशाली” के लिए तो ये “नियम” है
कि वो रोज “नए वस्त्र” पहनकर दर्शन करे!

 

इसमें बड़ा रहस्य छिपा हुआ है.
रोज नए वस्त्र पहनेगा तो जो वस्त्र उतरेंगे तो देगा किसको?
“कमजोर स्थिति वाले “श्रावक” को?
कभी नहीं.
“श्रावक” तो खुद “धर्म” का एक अंग है.
भगवान महावीर ने “धर्म” के चार आयाम बताये हैं : साधू, साध्वी, श्रावक और श्राविका.
इसलिए जो “श्रावक” और “श्राविकाओं” को “अपनी हैसियत” से “कमजोर”  देकर
“भक्ति” करने का “बहाना ” करता है,
वो असल में “पुण्य” का उपार्जन ही नहीं करता.

 

बात थी “वस्त्र” की.
जो धनी (rich) उतरे हुवे वस्त्र देगा कमजोर परिस्थिति वाले “अन्य” व्यक्ति को.
जो उसके लिए तो नए ही होंगे.
इससे उन व्यक्तियों में भी “जिन शासन” के प्रति “अहोभाव” रहेगा.
वो भी उस मंदिर के दर्शन बड़े भाव से करेंगे जिसके दर्शन वो “सेठ” करता है.
इससे जिन शासन की रोज प्रभावना होगी.

(किसी को मात्र कुछ देना प्रभावना नहीं है, प्रभावना वो है जिससे जिनशासन के प्रति लोगों में बहुमान बढे).

“दर्शन” करने की बात चालू है….

विशेष : ऊपर लिखी  जो  बात सामान्य लोगों को “असामान्य” (uncommon) लगती हो, वही जैन धर्म का चमत्कार है.

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