नमस्कार और आशीर्वाद – 9

कई जन पूछते हैं कि “पुण्य” को प्रकट करने के लिए क्या करें, उसका उत्तर इस पोस्ट में दिया गया है.

मंदिर जी जाने के लिए तैयार होना; मतलब बहुत बड़े पुण्य का उपार्जन करना.

जिस पकार बड़ा धंधा चल रहा हो तब हम अनावश्यक फ़ोन या तो अटेंड नहीं करते या फिर उन्हें कुछ  देर बाद बात करने का कहते हैं, उसी प्रकार जिस समय जिन-मंदिर के दर्शन के  लिए निकलें हों उस समय “अन्य” कोई बात हमारे मन में नहीं होनी चाहिए.
पूरा आनंद ले सकें कोई भी कार्य करते समय, इसके लिए हर व्यक्ति को “वर्तमान” में जीवन जीना चाहिए.
मंदिर जाते समय, मन को “ठिकाने” रखने के लिए, मंदिर की बात, प्रतिमाजी की बात, स्तोत्र की बात, नवकार मंत्र की बात…ये सभी बातें ही मन में रहनी चाहिए. इससे मंदिर जाने की क्रिया में आनंद रहेगा. मुख पर हड़बड़ी नहीं बल्कि प्रसन्नता के निशान होने चाहिए. ये “प्रसन्नता”  “खुद” के लिए “आधाघंटा” ज्यादा निकालें, तो आ सकती है. इसका प्रभाव पूरे दिन रहेगा.

 

मन को प्रसन्न रखने के “शास्त्रों” में बताये गए उपाय:
मंदिरजी के दर्शन करने  का प्रभाव ये होता है:
१ उपवास का फल : मंदिर जाने की इच्छा करना
२ उपवास का फल : मंदिर जाने के लिए खड़े होना.
५ उपवास का फल : मंदिर जाने के लिए पग आगे रखना
१५ उपवास का फल : मंदिर जाने के “आधे” रास्ते तक पहुंचना
(आधा रास्ता कहाँ आता है, उसकी जाग्रति रखना)
३० उपवास का फल : मंदिर के दर्शनदूर से करना
६ मास के उपवास का फल : मंदिर के एकदम पास आना
१ वर्ष के उपवास का फल : मंदिर के “गभारे” के पास आना
१०० वर्ष के उपवास का फल: प्रभुजी की तीनप्रदिक्षणा देना
१००० वर्ष के उपवास का फल : प्रभुजी की अष्ट प्रकारी पूजा करना
१,००,००० वर्ष के उपवास का फल : प्रभुजी को सुगन्धित पुष्प की अपने हाथ से गुंथी हुई माला पहराना.

 

सामान्य लोगों को इसमें कोई लॉजिक नज़र नहीं आता हों, परन्तु ये बात केवलज्ञानियों ने कही है. कई बातों तक हमारी “बुद्धि” पहुँच ही नहीं सकती, सारी बातें हमारी बुद्धि ग्रहण नहीं कर सकती, जो कॉमर्स का स्टूडेंट है, उसे साइंस की बातें समझ में नहीं आती और जो साइंस का स्टूडेंट है उसे आर्ट्स के इतिहास की बातें बकवास लगती हैं. कई वस्तुएं हमारी आँखें देख ही नहीं सकती. दूर की वस्तुएं हमें “छोटी” नज़र आती हैं, ये इस बात का प्रमाण है. ज्यादा दूरी की वस्तुएं हमें दिखती ही नहीं हैं. अँधेरे में वस्तुएं  दिखती नहीं है क्योंकि “आँखों” को देखने के लिए “प्रकाश” चाहिए. परन्तु यही अँधेरे में पड़ी वस्तुएं “केवलज्ञानी” को “दिखती” हैं. हम जो “देख” पाते हैं, उससे भी “अच्छी तरह” वो देख पाते हैं अपने ज्ञान से.

 

एक प्रत्यक्ष उदाहरण: छोटी सी वस्तु से बड़ा व्यापार: पूछो एक जौहरी से 5 कैरट का एक “हीरा” बेचने के बाद उसे कितने दिन कमाने की जरूरत नहीं पड़ती. दूसरा – यही कारण है कि हीरे के धंधे में ज्यादातर व्यक्ति जैनी ही है.

ऊपर की बातों से ये प्रमाणित होता है  जो केवलियों ने कहा है, उसे अपनी “बुद्धि” की कसौटी पर नहीं कसना  चाहिए. क्योंकि हमारी “बुद्धि” रुपी “कसौटी” ही “खोटी” है.

फोटो :
अति प्रभावशाली श्री विमलनाथ भगवान,
सुमेरु अपार्टमेंट, पाल, सूरत.

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