नमस्कार और आशीर्वाद – 8

प्रभु के दर्शन कैसे करें?

पूर्व भूमिका  :

१. मंदिर जाने की पूर्व तैयारी:
पहले चावल, बादाम, मिश्री,  नैवेद्य, धन, इत्यादि मंदिर में चढाने के लिए तैयार रखें.
शुद्ध वस्त्र वैसे पहनें जैसी हमारी “हैसियत” (capacity) है.
२. जो धनी (rich) उतरे हुवे वस्त्र देगा कमजोर परिस्थिति वाले “अन्य” व्यक्ति को.
तो उसके लिए तो नए ही होंगे.
इससे उन व्यक्तियों में भी “जिन शासन” के प्रति “अहोभाव” रहेगा.

 

अब आगे:
अभी तक हम मंदिर के दर्शन करने के लिए घर से बाहर निकले नहीं हैं. बस घर से निकलने की तैयारी है. इतने में आपके समधी (relatives-in-laws) आ जाते हैं….आप मंदिर जा रहे हैं और पूजा नहीं करते तब तो आपको रुकना पड़ेगा घर पर ही.

पर यदि पूजा के वस्त्र पहन रखे हैं, तो समधीजी को रुकना पड़ेगा. ये है “विधि” से “मंदिर” जाने का फायदा.  आपको उनके लिए ना रुकने का कोई बहाना बनाने की जरूरत नहीं पड़ेगी.  अच्छा तो ये है कि आप उन्हें भी “मंदिर” साथ ले चलें हो सके तो. या कहें कि मैं ही बाद में आप के पास आ जाता हूँ. दूसरी बार वो आपको उस समय मिलने नहीं आएंगे जिस समय आप मंदिर जाते हों.
ये अनुभव किया गया है कि जो “सर्दी” में भी रोज मंदिर में भगवान की पूजा करने के लिए नहा कर घर से  निकलते हैं, उन्हें लगभग  कभी “सर्दी” नहीं होती.

 

दूसरा,

उनका सारा काम व्यवस्थित होता है दिन भर के लिए.
विशेषतः जब वो सवेरे प्रतिक्रमण भी करते हों.
कारण ये कि सवेरे जल्दी उठना होगा.
जल्दी उठने के लिए जल्दी सोना भी होगा.
यानि मात्र “दिन” नहीं सुधरेगा, पूरा “जीवन” सुधरेगा.
पूजा करने वाले व्यक्ति के हर काम में फुर्ती रहती है.
कुछ दिन करके देख लें.

यदि अब भी कोई कहे कि पूजा “बाद में चालू करेंगे” तो समझ लेना
उनके  “आलस्य” का और कोई प्रमाण देने की आवश्यकता नहीं है. 🙂

 

तीसरा,

दर्शन करने के लिए घर से  बाहर निकलकर मंदिरजी के द्वार तक  पहुँचने पर
आप वो पुण्य बांधते हैं, जिसकी आप “कल्पना” भी नहीं कर सकते. अन्य सम्प्रदायवाले इस बात से सहमत नहीं होंगे.
परन्तु वे “उमास्वातिजी” के “तत्त्वार्थ सूत्र” से सहमत हैं:
“मन: एव मनुष्याणां  कारणं  बंध मोक्षयो”
मन से ही मनुष्य कर्म बांधता है.
मोटे रूप से कर्म के दो प्रकार हैं: पुण्य और पाप.
मोटे मन से ही साधू को खीर बोहराकर “शालिभद्र” के जीव ने अनंत पुण्य बाँधा था.

 

तो अब सोचो,
जिनेश्वर भगवान के मंदिर की और जाने की तैयारी
और
रास्ते में उच्च भाव लेकर “दर्शन” करने वाला कितना “जबरदस्त “पुण्य बांधता होगा?

विशेष: हर स्थान पर हर समय साधू-साध्वी नहीं मिलेंगे पर जैन मंदिर हर गाँव में मिलेंगे जहाँ आप रोज “दर्शन-पूजन” बड़े आराम से कर सकते हैं. जैनों का पुण्य इतना प्रबल है.

आगे पढ़ें… : नमस्कार और आशीर्वाद – 9

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