“परस्परोपग्रहोजीवानां”

संसार के सभी जीवों का आपस में सम्बन्ध है.
हमारा सम्बन्ध तो बहुत ही गिने चुने लोगों से है.
उनसे भी हमारे सम्बन्ध हैं : परन्तु कड़वे ज्यादा हैं, मधुर कम हैं.
 
एक कड़वे फल का स्वाद कैसा है : कड़वा.
उसमें स्वाद तो है पर “कड़वा.”
उस कड़वे फल में कुछ “स्वाद” होने पर भी उसे “स्वादिष्ट” नहीं कहा जा सकता.
इसी प्रकार जिनसे हमारे सम्बन्ध “कड़वे” हैं, उनसे हमारा कोई सम्बन्ध नहीं कहा जाता.
 
क्या ये होना चाहिए?
उत्तर सभी जानते हैं.
फिर भी हम “सुधरते” नहीं हैं.
 
मजा तो इस बात का है
ये “टैग” हम जैनी हर जगह लगाते हैं :
“परस्परोपग्रहोजीवानां”
(जबकि कुछ जैन सम्प्रदायों का आपस में कुछ भी “सम्बन्ध” नहीं है, मात्र दिखावा करने के लिए कभी कभी मंच पर एक साथ बैठ जाते हैं.
अरे! कइयों का तो एक ही सम्प्रदाय में होते हुवे भी “आपस” में “सम्बन्ध” नहीं है, ये जैन धर्म के ठेकेदारों की वास्तविकता है – यहाँ उन्हें ठेकेदार इसलिए कहा है क्योंकि वो “मानते” हैं कि “धर्म” उन्हीं के कारण चल रहा है).
 
विशेष-
“संसार” में जब तक किसी “एक” भी जीव से ही यदि कड़वा सम्बन्ध “कायम” है, तब तक “मुक्ति” नहीं होगी, ये “मुक्ति” के पथ पर चलने का दावा करने वाले “पंथवादियों” को अपने दिमाग में “घुसा” लेनी होगी क्योंकि “मोक्ष-द्वार” पर किसी भी “पंथ” या समुदाय की “घूस” नहीं चलती.
(जीवन में कई बार हमने पार्श्वनाथ भगवान्  का जीवन चरित्र पढ़ा  या सुना  है – हर बार “झांकी” के हर चित्र को हाथ   जोड़   कर ही  “आगे ” बढे  हैं.  “भगवान् पार्श्वनाथ” को पूर्व जन्म के सगे भाई ने दस दस भवों तक “पीछा” नहीं छोड़ा. हम में  से भी तो कई  अपने  सगे भाई से  वैसा ही बर्ताव कर रहे हैं – वास्तव में हम कितने “आगे बढे हैं” – क्या वो खुद  “कमठ ” के  अवतार नहीं हैं? -जरा चिंतन कर लें).

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