भक्तामर स्तोत्र में :
“सूर्य” का वर्णन इन गाथाओं में आया है :
१. त्वत्संस्तवेन भवसंतति सन्निबद्धं …. “सूर्यांशु”- …..भिन्नमिव शार्वर मन्धकारम् ||७||
२. आस्ताम् तव स्तवनमस्त समस्त दोषं……. “पद्माकरेषु”…. जलजानि विकासभांजि ||९||
३. नास्तं कदाचिदुपयासि …… “सूर्यातिशायी” ……………….महिमासी मुनीन्द्र! लोके ||१७||
४. किं शर्वरीषु “शशिनाsह्नि” विवस्वता वा?…… कार्यं कियज्जलधरैर् जलभार-नम्रै: ||१९||
५. ज्ञानम् यथा त्वयि विभाति कृतावकाशम् …… नैवं तु काच-शक्ले “किरणाकुलेsपि” ||२०||
६. स्त्रीणां शतानि शतशो …. सर्वा दिशो दधति “भानि” सहस्ररश्मिं ………||२२||
७. उच्चैरशोकतरु …. किरणमस्त-तमो वितानं …. बिम्बम् रवेरिव …….||२८||
८. सिन्हासने मणि-मयूख …. विभ्राजते ….. कनकावदातं … सहस्ररश्मे: ||२९||
९. छत्रत्रयम् तव विभाति …. “भानुकर” प्रतापम् … परमेश्वरत्वं ||३१||
१०. शुम्भत्प्रभावलय ….. प्रोदयद्-“दिवाकर” …….. सोम सौम्यं ||३४||
मेरी मंद बुद्धि जहाँ तक विचार कर सकती है,
उसके अनुसार “श्री मानतुंगसुरीजी” को
अँधेरी कोठरी में बंद करने के बाद “प्रकाश” के लिए
“प्रभु आदिनाथ” के अलावा कोई और
दूसरा “भाव” ही नहीं आया.
आदिनाथ भगवान को “वंदन” करने से
जब जीव “जन्म मरण” के “बंधन” से सदा के लिए “मुक्त” हो जाता है,
तो फिर “अँधेरी कोठरी” का “बंधन” क्या चीज है!
“सूर्य” प्रकाश देता है….
पर “रात” को नहीं देता..
जबकि “अरिहंत” के “ज्ञान” के
“प्रकाश” के सामने “करोड़ों” सूर्यों
का प्रकाश भी फीका है क्योंकि
“प्रकाशवान” सूर्य को तो राहु भी कभी ग्रसित कर लेता है….
जबकि “भगवान आदिनाथ” का
प्रभाव तो “अचिन्त्य” है.
(“भगवान आदिनाथ” के श्रेष्ठ कुल पर लिखी मेरी पोस्ट पढ़ें
– उनके सभी पुत्र और पौत्र भी मोक्ष ही गए).
भक्तामर स्तोत्र में श्री मानतुंगसुरीजी ने
भगवान आदिनाथ का “उत्कृष्ट वंदन”
किया है.
विशेष :
“भगवान महावीर” के शासन में जन्म लेने वाले
श्री मानतुंगसुरीजी का भाव सीधा पहले तीर्थंकर “भगवान आदिनाथ” पर गया!
उनकी ५०० धनुष की काया,
लुभावना और तेजस्वी
पर शीतलतायुक्त मुखाकृति,
सुखमय काल, सीधी प्रजा, इत्यादि की
कल्पना भी सहज ही हो जाती है.
फिर भला कोई भी कार्य सहज क्यों ना होगा!
फोटो:
श्री आदिनाथ भगवान का मंदिर,
नाहटों का मोहल्ला, बीकानेर
(इस प्रतिमाजी के नेत्र अद्भुत हैं).
आगे जानने के लिए देखें भाग २