सरस्वती देवी

आचार्य भगवंत जब सूरी मंत्र की आराधना करते हैं तो

वो सर्वप्रथम श्रुतदेवता यानि सरस्वती की ही आराधना करते हैं.

श्रुतदेवता की स्तुति:

कमलदलविपुलनयना, कमलमुखी कमलगर्भसंगौरी |
कमले स्थिता भगवती, ददातु श्रुतदेवता सिद्धिम ||

इस स्तुति में सरस्वती देवी का सौंदर्य का वर्णन तीन विशेषणों से किया गया है.

(स्त्री जाति का स्वभाव है कि उसे अपने रूप की प्रशंसा अच्छी लगती है.

भले भी वो देवी ही क्यों ना हो)!

आँखें : कमल की पंखुड़ी जैसी तीखी हैं
मुख : खिले हुए कमल जैसा है
वर्ण : कमल के गर्भ जैसा श्वेत है.

 

और वो स्वयं भी कमल पर ही स्थित है!

सरस्वती देवी के इस स्वरुप का “ध्यान”
करने से मन अत्यंत प्रसन्न हो जाता है.

(सामने अति सुन्दर सरस्वती देवी की प्रतिमा रखने से
“ध्यान” करने में बड़ी सहायता मिलती है,
इसलिए प्रतिमाजी का आलम्बन लिया जाता है).

 

प्रसन्नता से किया गया हर कार्य सफल होता है.

स्वयं देवी-देवता भी प्रशंसा से खुश होते है.

किसी  भी श्रुत ज्ञान के बारे में जानना हो,
तो बड़े ही भाव से सरस्वती देवी की स्तुति
सबसे पहले करनी चाहिए.

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