काउसग्ग : जैन विधि से “ध्यान” की “सरलतम” व्याख्या

काउसग्ग में सबसे पहले “शरीर” का भान भूलना है.
(जैसे कि “दिगंबर” साधू अपने “शरीर” का भान भूल चुके होते हैं).

पहले इसका खूब अभ्यास कर लो.

एक पोस्ट में मैंने रोज रात को सोते समय “मरने” की बात कही है, 6-8 घंटे के लिए .
ये भी “शरीर” और उससे सम्बंधित जो रिश्ते नाते हैं, उनसे “ममत्व ” तोड़ने के लिए है.

जब शरीर से ममत्व नहीं रहेगा,
तो भौतिक साधनों पर भी ममत्व नहीं रहेगा
फिर “ध्यान” सीधा “आत्मा” पर ही लगेगा.

बस अपना काम बन गया,
जो जन्म-जन्मांतर में आज तक नहीं बना था.

आगे की स्टेज आप खुद अभ्यास करते करते पा लोगे.

विशेष:
काउसग्ग में कोई मंत्र जप की आवश्यकता नहीं होती.
“नवकार” और “लोगस्स” का काउसग्ग तो नौसिखिए या “सामान्य श्रावकों” के लिए है,
जो अभी “उत्कृष्ट” ध्यान नहीं कर पाते.

“उत्कृष्ट” ध्यान करने वाले को तो एक स्टेज के बाद “आँखें” ही बंद नहीं करनी पड़ती.

जब “ज्ञान” प्रकट हो जाता है, तब फिर क्या “व्यक्ति” आँखें बंद करके “ध्यान” लगाएगा?
(“ज्ञान” के लिए “ज्ञान-चक्षु” शब्द भी प्रयोग में आता है).
इसीलिए तीर्थंकरों की आँखें “खुली” होती है,
क्योंकि उनके मुख से निरन्तर “ज्ञान की गंगा” बहती है.
(“आँखें” बंद करके कोई “व्याख्यान” थोड़े दिया जाता है) !

जैनों की सारी क्रियाएं “ज्ञान” प्राप्ति के लिए है.
भूल से ज्यादातर लोग “पुण्य” के लालच में फंसते हैं.
“फंसाने” वाले कौन है, वो लिखने की जरूरत नहीं है.

ये वही लोग हैं जो खुद बौद्ध धर्म की विपश्यना से प्रभावित हैं.
और जैन धर्म की योग – क्रिया को “पचा” तो क्या,
अभी तक “समझ” भी नहीं पाये.

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