धन्य जैन धर्म!

क्या भगवान महावीर ने अपने साधुओं को

बहुत अधिक और श्रावकों को बहुत कम दिया है?

इसका उत्तर है : नहीं

न सिर्फ “भगवान महावीर” ने बल्कि “उनके साधुओं” ने

श्रावकों को उनकी योग्यता से

कम से कम

१००० गुना ज्यादा दिया है.

 

प्रश्न :

कैसे?

उत्तर:

जैन धर्म में सबसे बड़ा मंत्र नवकार है.
आचार्य, उपाध्याय और साधू भी नवकार गुणते हैं
और यही श्रावकों  को  दिया हुआ है.

चौदह पूर्वधर भी अपने अंतिम समय में “नवकार” का ही जाप करते हैं.
(जरा विचार करो, जिन्हें सब  शास्त्रों का ज्ञान हो,
तो फिर वे “नवकार” का ही जाप क्यों करते हैं)?

 

लोगस्स का पाठ साधू भी करते हैं
और यही श्रावकों को भी दिया हुआ है.

नमुत्थुणं साधू भी बोलते हैं और श्रावकों को तो ये “विशेष” रूप से दिया हुआ है.
(नमुत्थुणं के बारे में अन्य पोस्ट पढ़ें).

भक्तिपूर्वक ठाठ से जिन पूजा-प्रक्षाल करके
इन्द्र जैसा भगवान का जन्म महोत्सव मनाने का “मजा” किसने दिया?

 

जिन-धर्म ने!

और श्रावकों को तो ऐसा आनंद रोज लेने की व्यवस्था की गयी है.
विशेष:
पार्श्वनाथ भगवान ने देव गति में रहे हुए ५०० कल्याणक महोत्सव मानते हुए “आदेय” नाम कर्म का उपार्जन किया और उसी कारण उनकी प्रतिमा सबसे ज्यादा पूजी जाती है.

फोटो:

श्री महावीरस्वामी आगम मंदिर, गोपीपुरा, सूरत

More Stories
आने वाला “जीवन” मंगलमय करें इस दिवाली से.
error: Content is protected !!