आपके पड़ -दादा का फोटो आपके पास है?
आप के दादा का फोटो आप देखना पसंद नहीं करते?
आप के पिता का फोटो आप नहीं रखना चाहते?
यदि पड़-दादा का फोटो हाथ में आ जाए,
तो “घर” में रखना नहीं चाहोगे?

तो फिर जगत-पिता तीर्थंकर का फोटो
घर में रखने में कौनसी “बाधा” है?
“आशातना” का डर है?
“घर” में भी तो “चोरी” होने का “डर” होता है,
फिर “घर” में “पैसा-गहने” क्यों रखते हो ?

अरे! आशातना का “डर” है तो “सावधानी” रखो,
इसका मतलब ये नहीं कि “भगवान्” का
फोटो ही घर में ना रखो.

अपनी “कुंठा” को हटाओ
और “विवेक” से काम लो.
हम जैनी हैं,
अपने इतिहास को पढ़ो,
उसके बारे में जानो,
तब पता पड़ेगा कि हमने आज तक क्या खोया है.

“विलुप्त प्राय: जैन साधना” का
सबसे बड़ा कारण अपने ही “जैन- सूत्रों” की गहराई
ना समझना/समझाना/समझा पाना है.

अपने अपने समुदाय के अनुसार
जिन-सूत्रों का “अर्थ-घटन करना”
सबसे बड़ा “दोष” रहा है.

जैन साधना
एक “अभ्यास” नहीं,
“जीवन” है,
जीवन !

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