“वीतराग भाव” प्रकट करें स्वयं में!

“खामेमि सव्वे जीवा, सव्व जीव खमन्तु मे |
मित्ति  मे सव्व भुवेसु, वैरं मज्झ न केणई ||”

पर्युषण के समय हम ये सूत्र बोलते हैं.
हमारे ज्यादातर कर्म “शत्रुता” से बंधते  हैं.

 

इसीलिए हम सभी “जीवों” से “क्षमापना” करते हैं और उनसे ये प्रार्थना करते हैं कि वो हमें “क्षमा” करें.
फिर ये भी कहते हैं कि मेरी सभी जीवों से “मित्रता” है, मेरा कोई  “शत्रु ” नहीं है.

अन्य धर्म में ये कहा गया है कि
“तुम अपने शत्रुओं से भी प्रेम करो”

 

जैन धर्म ये कहता है कि मेरा तो कोई शत्रु ही नहीं है, सभी मित्र हैं.
(इसलिए “शत्रु” शब्द ही हमारी “डिक्शनरी” मैं नहीं होना चाहिए).

श्री हरिभद्र सूरी के सांसारिक भांजे हंस और परमहंस को जब बौद्धों ने मारा,  तब उनके “क्रोध” ने सभी बौद्धों को मारने तक की ठान ली. उनके गुरु उस उन्हें खूब समझाया पर अंत में उन्हें एक ग्रन्थ दिया खुद ही पढ़ने के लिए.  उस  “समरादित्य चरित्र” को पढ़कर  श्री हरिभद्र सूरी का क्रोध शांत हुआ और प्रायश्चित्त स्वरुप 1444  ग्रंथों की रचना करने की प्रतिज्ञा की.
(जैनों का क्रोध भी किसी कारण वश हो तो वो भी कल्याणकारी होता है, क्या ये चमत्कार से कम है)!

 

दस भव पूर्व खुद के भाई के साथ भगवान पार्श्वनाथ का जो बैर बंधा, वही भाई का “जीव” अंतिम भव में  भी “कमठ” के रूप में प्रकट हुवा.

वीतराग होने पर तीर्थंकर के भव में उन्होंने उसके प्रति कोई बैर भाव नहीं किया, इसलिए वो बैर परंपरा वहीँ समाप्त हो गयी.

सरस्वतीपुत्र श्री हेमचंद्राचार्यजी ने कहा है :

कमठे  धरेणेन्द्रे च स्वोचितम् कर्म कुर्वति  |
प्रभुस्तुल्यमनोवृत्ति पार्श्वनाथ: श्रेयस्तु व: ||

 

“कमठ” ने भगवान पार्श्वनाथ को “उपसर्ग” दिए, “धरणेन्द्र” ने उसे “हटाया” परन्तु भगवान को तो उन दोनों पर एक सा ही भाव था. कमठ पर कोई “धिक्कार भाव” नहीं था और धरणेन्द्र पर कोई “अहोभाव” नहीं था.

जैन धर्म के एक एक सूत्र पर हज़ारों वाक्य लिखे जा सकते हैं.

जिसे इसका आनंद लेना है, उनके लिए ये उपलब्ध है.
जिन्हें “शॉर्ट कट” में चाहिए,  उनके लिए “सूत्र” है.

तत्त्व” की बात भूलें नहीं, “सूत्र” की रचना” इसके लिए की जाती है.

इसे  वैसा ही समझें, जैसे परीक्षा के समय हम “शॉर्ट नोट्स” बनाते थे, “विशेष बातें” याद रखने के लिए. जब वो इम्पोर्टेन्ट पॉइंट्स हमें याद हों, तो हम उन्हें विस्तार से लिख सकते हैं. हर “भाषण” देने वाला भी यही करता है.

 

प्रश्न:
वीतराग भाव प्रकट करें स्वयं में, ये कहना बहुत सरल है, करना बहुत दुष्कर. इसका कोई सरल उपाय है?
उत्तर:
यदि “वीतराग भाव” खुद में प्रकट करना हो, तो सबसे पहले इसकी महत्ता जाने.
तीर्थंकर क्यों पूजे जाते हैं?
क्या उन्होंने “खूब चमत्कार” दिखाए हैं?
उत्तर है नहीं.
मनुष्य जन्म “चमत्कार” “दिखाने” के लिए नहीं  है.
“मनुष्य जन्म” अपने आप में “चमत्कार” से कम नहीं है.

उसे और श्रेष्ठ बनाने के लिए-
“वीतराग भाव” प्रकट करने के लिए-

सरल विधि है:
रोज “प्रतिक्रमण” करना!

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