क्या “चमत्कार” होता है?

jainmantras.com खुद ये प्रश्न करे, यही एक चमत्कार है!

नदी अपने आप बहती है. कोई भी “नदी” बनाता नहीं है.  अन्य नदियों की तरह “गंगा नदी” भी इसलिए “देवी” की तरह पूजी जाती है. क्योंकि वो “अपने आप” बहती है. यही चमत्कार है.

पानी “जीवन” है, इसीलिए पवित्र है. मूर्ति पर “जल का अभिषेक” करना ये सन्देश देता है कि वो “पूजा” में काम आता है इसलिए हम उसे “व्यर्थ” कैसे बहा सकते हैं?

 

कई जगह जहाँ झरना बहता है, वहीँ मूर्ति की स्थापना करके लोग ये कहते हैं की मूर्ति पर अपने आप जल का अभिषेक हो रहा है. ऐसा करने से लोगों में “श्रद्धा” बढ़ती है. “श्रद्धा” का मूल्य ना समझने वाले इसे  “अंधश्रद्धा” कहते हैं.

पर्वत अपने आप बनते हैं, कोई उन्हें बनाता नहीं है. जितने भी तीर्थ बने हैं वो पर्वत पर बने हैं. वहां का “प्रदूषणमुक्त” जीवन “आध्यात्मिक” सन्देश देता है. “प्रकृति” ने हमें “खूबसूरत” वातावरण दिया है, इसलिए “पर्यावरण” की रक्षा करना हमारा कर्त्तव्य है. यही कारण है कि तीर्थ के साथ “पर्वत” भी हमारे लिए पूजनीय हो जाता है.

पेड़ अपने आप उगते हैं. कोई उन्हें जंगल में उगाने नहीं जाता. वे फल भी देते हैं और छाया भी. यही “चमत्कार” है.
हम उन्हें “काटकर” फर्नीचर ही नहीं बनाते, जरूरत पड़ने पर जला भी डालते हैं.

 

“प्रगति” के नाम पर हमने “प्रकृति” के साथ “छेड़खानी” ज्यादा की है. यही कारण है कि “तापमान” दिनोंदिन बढ़ रहा है. वैज्ञानिक कारण ढूंढते हैं – रोज नया “कारण” बताया जाता है पर हमारी “आदतें” ऐसे पड़ गयी है कि “वो चाहे कुछ भी कहे, हमें करना वही है जो हमें सुविधानक लगता है.

 

कहने का सार ये है कि “साधना” करने के स्थान हैं :

1. नदी का किनारा,

2. पर्वत के ऊपर और

3. पेड़ के नीचे.

ज्यादातर ऋषि-मुनि नदी के किनारे ही साधना करते हैं.
“जगतसाम्राट श्री शांतिसुरीजी” ने आबू पर्वत पर साधना की है.
भगवान महावीर ने उपदेश “अशोक वृक्ष” के नीचे दिए हैं.

 

“मंत्र साधना” करने से पहले “मन तर” होना चाहिए जो कि “प्राकृतिक  वातावरण (Natural Environment)” से ही हो पाता है. ऐसे स्थान पर बैठने से किसी के भी प्रति दुर्भावना नहीं होती क्योंकि जो वातावरण “स्वयंभू” है (अपने आप प्रकट हुआ है), वहां  “स्वयं-सिद्धि” हो ही जाती है.

(ये सन्देश उन साधुओं के लिए भी है (सभी के लिए नहीं), जो आज अपने नाम से बड़े बड़े मठ बना कर बैठे हैं और कहने भर के लिए साधना करते हैं. उन्हें साधना करने के लिए समय ही कहाँ है? मठ बनाकर  वास्तव में वो “वापस” वही “अपना” रहे हैं, जो उन्होंने “छोड़ा” था. जितना “छोड़ा” था, उससे कई गुना “बसा” के बैठे हैं).

 

जितने भी “राजर्षि” हुवे हैं, उन्होंने साधना “जंगलों” में ही की है. “दिगंबर साधू” आज भी जंगलों में “साधना” करते हैं. “धन्य” हैं वो !

दूसरे वो भी “धन्य(?)” हैं, जो पहले सब कुछ छोड़कर (वास्तव  में तो था भी कुछ नहीं) अब  इस तरह अपना बैठे हैं जैसे सुबह का भूला वापस “घर” आ गया हो!

भगवान महावीर ने साफ़ कहा है कि ऐसे लोग साधू नहीं है, मात्र  सफ़ेद  वस्त्र पहनने से कोई साधू नहीं हो जाता.

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