सत्ता किसकी शरीर की या आत्मा की?

सत्ता किसकी?

शरीर की या आत्मा की?
मरना किसका होता है?
शरीर का या आत्मा का?
“अनुभव” किसको होता है?
शरीर को या आत्मा को?
“सुख” किसे महसूस होता है?
शरीर को या आत्मा को?
दुःख कौन भोगता है?
शरीर या आत्मा?

 

हम जिन्दा हैं तो कैसे?
शरीर में आत्मा है इसलिए!
हम मर जाते हैं तो कैसे?
शरीर से आत्मा निकल जाती है इसलिए!

तो अब जीवन कैसे जिया जाए,
यही रहस्य है.

 

शरीर की उत्पत्ति, विकास और बुढ़ापे में क्षय,
इन सबके होने के कारण “जीव” खुद को “आत्मा” ना समझकर
“शरीर” ही समझ बैठता है.

“उगमे इ वा, ध्रुवे इ वा, विगमे इ वा”
तीर्थंकरों से इन तीन पदों को तीन बार सुनकर सभी गणधरों में “चौदह पूर्व” का ज्ञान हो जाता है.
गुरु परम्परा से तीर्थंकरों की ये वाणी  सुनकर भी हम कुछ समझने की कोशिश नहीं करते.
क्योंकि हम “ज्ञान” प्राप्ति से “डरते” हैं.
“ज्ञान की प्राप्ति” होने पर हमें हमारे “शरीर के सुख” छिन जाने का “भय” लगता है.

 

कई साधू-साध्वी बुढ़ापे तक भी “आत्म-तत्त्व” को नहीं ग्रहण कर पाते.
ये बात उनकी है जो अपने “आत्म-कल्याण” के लिए दीक्षा लेते हैं.

“आत्म-तत्त्व” पर “श्रद्धा” – यही सम्यक ज्ञान है.
पर इसे ही छोड़ कर जीव दूसरे  हर प्रकार के ज्ञान लेने के लिए उत्साहित होता है.
नए नए शास्त्र पढता है,
नयी नयी व्याख्या पढता है,
अच्छा भाषण देता है,
और  जब खुद के “नाम” की बात आये तो “आत्म-तत्त्व” को भूल कर
वो सब करता है जो एक आम इन्सान करता है.

 

“आमंत्रण पत्रिका” में कभी अपने गुरु या खुद का नाम ना छपे तो फिर मत पूछो कि “मन” में कितना आर्त्त ध्यान होता है !
तब “उपदेश” होता है : श्रावकों में “विवेक” नहीं है.

यदि यही “राग” “नाम” के लिए है, तो समझ लें कि इसका “आत्मा” से कोई सम्बन्ध नहीं है.
और कितनी भी “पूजा विधि” और “क्रिया” क्यों ना कर लें, वो आत्म-तत्त्व को “स्पर्श” भी नहीं कर पाये हैं.

विशेष: हमारी इन आँखों में “आत्म-तत्त्व” को देखने की शक्ति  नहीं है. जिस प्रकार एकदम तेज प्रकाश में कुछ भी नज़र नहीं आता (अँधेरे में भी नहीं आता), उसी प्रकार “आत्म-पुंज” को इन आँखों से नहीं देखा जा सकता, मात्र “ध्यान” से ही देखा जा सकता है. (जिस प्रकार तेज प्रकाश को देखने के लिए “काला चश्मा” लगाया जाता है वैसे ही “आँखें” बंद कर के “आत्म-तत्त्व देखा जा सकता है). हाँ, केवल ज्ञानी इस तत्त्व को देख पाते हैं फिर भी इसका “वर्णन” अपने “शब्दों” से नहीं कर सकते.

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