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मति, श्रुत, अवधि और मन: पर्यव ज्ञान होने पर भी भगवान महावीर ने “ध्यान” किया

मति, श्रुत, अवधि और मन: पर्यव ज्ञान होने पर भी भगवान महावीर ने “ध्यान” किया.

वर्तमान में क्या हो रहा है?

बहुत सी धर्म क्रियाएं तप आदि होते हुवे भी “ध्यान” का प्रचलन जैन साधुओं में बहुत कम है, विशेषकर श्वेतांबर सम्प्रदाय में. जब कि मालाएं खूब गुणी जाती है! पर ध्यान रहित होकर! संख्या पूरी हुई, माला पूरी हुई! ?

अधिकतर साधू स्वयं के चिंतन से रहित होकर शास्त्र पढ़ने में लगे हैं. उसे ही अधिक से अधिक जानने में लगे हैं. श्वेतांबर समुदाय में जैन ग्रंथों का विशाल भंडार है, इतना अधिक कि ये जीवन कम पड़ेगा सारा पढ़ने के लिए!

फिर भी वो अनुभव इसलिए नहीं कर पाते क्योंकि चिंतन ही शुरू नहीं हुआ, ध्यान की शुरुआत ही नहीं हो पाई, ये अधिकतर की स्थिति है.

वर्ना जहां लगभग 25 हजार साधू हों, और हर श्रावक को ध्यान न करना आता हो, ये स्थिति थोड़ी होती?

इतना बड़ा समुदाय हो तो अब तक धर्म का डंका पूरे भारत में फैल जाना चाहिए था!

पर नहीं!

हो रहा कि कुछ विशिष्ट शहरों तक ही अधिकतर का चातुर्मास होता है. बाकी जो होते हैं वो भी बड़े टोले के साथ रहना पसंद करते हैं ताकि धूम धमाके के गवाह रहें.

विद्वान साधुओं की कमी नहीं है, पर ज्ञानियों की कमी है. वो इसलिए कि “ध्यान” करना नहीं आता, ध्यान के अनेक ग्रंथ पढ़ लेने के बावजूद!

जैन समाज को इस बारे में जाग्रति लानी होगी. क्योंकि स्थिति ये हो रही है कि अपने आचार्यों को भी बौद्ध विपश्यना की साधना करनी पड़ रही है!

Jainmantras.com ने इस पहलू को बड़ी गंभीरता से लिया है, इसीलिए मंत्र साधना के माध्यम से श्रावकों में ध्यान के प्रति रुझान पैदा करने का प्रयास किया जा रहा है.

जिसके परिणाम भी सभी के सामने आ ही रहे हैं. वर्षों से धर्म क्रिया करने के बावजूद भी जब 99% को अनुभव शून्य देखा तो बहुत आघात लगा था.

अरिहंत कृपा से आज अनेक लोग नित्य मंत्र साधना से जुड़े हुवे हैं जबकि उनमें से कई लोग माला तो फेरते ही थे, पर अनुभव शून्य रहा.

लॉक डाउन के अगले दिनों में 14 दिन की साधना और करवाने का संकल्प है.

ध्यान के बिना साधना नहीं होती.
संकल्प के बिना शुभ ध्यान नहीं होता.

? महावीर मेरा पंथ ?

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