हे आदिनाथ !

हे आदिनाथ !

त्वच्चिन्तनम् जनयते विमलप्रबोधं
त्वच्चिन्तनम् जनयते सकलप्रमोदं
त्वच्चिन्तनम् जनयते सकलार्थसिद्धिम्
त्वच्चिन्तनम् जनयते खलु मोक्षसिद्धिम्

आपका चिंतन करने से बुद्धि निर्मल हो जाती है.
आपका चिंतन करने से सब तरह से आनंद हो जाता है.
आपका चिंतन करने से मनोरथ सिद्ध हो जाता है.
आपका चिंतन करने से मोक्ष भी प्राप्त हो जाता है.

हे युगादिदेव श्री आदिनाथ !

इस “संसार” रुपी
“रण” में
तेरी ही
“शरण” है.

हे जगबंधु !

आपके जितने भी “सांसारिक सम्बन्धी” थे,
वो सभी “मोक्ष” गए.
मैं भी “संसारी” हूँ
और
मैंने भी आपसे “सम्बन्ध” बना लिया है.
इसलिए मेरा भी “मोक्ष” अब निश्चित है.

हे आदिनाथ !

मैं इस जन्म में आपके दर्शन कर पाया,
इससे अधिक मेरा और क्या अहोभाग्य हो सकता है !

एक “चरणोपासक”

फोटो : SKR
श्री आदिनाथ भगवान् जिनालय
घेटी पाग,
पलिताना

विशेष:-
एक लकवाग्रस्त कारीगर को
इस प्रतिमा जी को “घड़ने” के लिए कहा गया.
(“वही” प्रतिमा जी घड़ेगा, ऐसा पहले से निश्चित था
परन्तु प्रतिमा जी “घड़ने” के मुहूर्त्त से पहले उसे लकवा हो गया)

“आश्चर्य” तब घटित हुआ
कि पहली ही हथौड़ी मारते ही
उसके “हाथ” में तेज “झनझनाहट” हुई
और
लकवा ठीक हो गया.

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